Ganga Mai ki Betiyan 26th June 2026/Image Credit: ScreenGrab / Youtube / @TellyChakkar
Ganga Mai ki Betiyan: दर्शकों के दिलों पर राज कर रहे शो ‘गंगा माई की बेटियाँ‘ में कहानी तब एक नया रूप लेती है, जब गंगा समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटी स्नेहा की ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। जहाँ दुर्गावती को पूरा भरोसा था कि गंगा अपनी बेटी स्नेहा को नौकरी ढूंढने से रोकेगी, वहीं पासा पूरी तरह पलट जाता है और चीज़ें दुर्गावती की सोच से अलग होती हैं।
मंदिर में जब दुर्गावती और गंगा की मुलाक़ात होती है तभी दुर्गावती स्नेहा के इरादों को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर करती है। वह गंगा को समझाती है कि स्नेहा को नौकरी ढूंढने का विचार छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे उनके परिवार की प्रतिष्ठा पर आँच आ सकती है। दुर्गावती को डर है चूँकि उन्हें आने वाले चुनावों के लिए पार्टी का टिकट मिल चूका है इसलिए लोग सवाल उठाएंगे कि इतने प्रतिष्ठित परिवार की बहु नौकरी क्यों ढूंढ रही है?
दुर्गावती को डर है कि विरोधी स्नेहा के इस फैसले को राजनीतिक मुद्दा बनाकर उनके खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए वह चाहती है कि गंगा अपनी बेटी स्नेहा को समझाए और फ़िज़ूल का विवाद खड़ा करने के बजाय, घर पर ही रहने के लिए उसे राज़ी करे।
लेकिन, गंगा का जवाब दुर्गावती की सोच से बिलकुल विपरीत होता है। गंगा, शांत स्वाभाव से आदरपूर्वक असहमति जताते हुए कहती है कि असल में सोच तो उन लोगों की गलत हैं जो किसी महिला के नौकरी करने को शर्म की बात मानते हैं। वह साफ़ कहती है कि स्नेहा बस मेहनत और ईमानदारी से आत्मनिर्भर बनना चाहती है और अपनी मेहनत से पैसे कमाने में कुछ भी गलत नहीं है।
गंगा, दुर्गावती को समझाते हुए कहती है कि स्नेहा के नौकरी करने से उसका सम्मान और सामाजिक रूतबा कभी काम नहीं होगा। वह स्नेहा के पक्ष में ढाल बनकर दुर्गावती से कहती है कि अगर स्नेहा ईमानदारी से काम करके अपने दम पर कुछ बनना चाहती है तो बल्कि उसका रास्ता रोकने की बजाय, उन्हें उसका हौसला बढ़ाना चाहिए। गंगा का अपनी बेटी स्नेहा के लिए ऐसा अनोखा समर्थन देखकर दुर्गावती स्तब्ध रह जाती है। यह पहली बार था जब गंगा ने स्नेहा को समझौता करने के लिए कहने के बजाय, दुर्गावती की पारम्परिक सोच को खुलकर चुनौती दे डाली।
यह टकराव कहानी को एक बेहद अहम मोड़ पर ले जाएगा। अब तक, जहाँ गंगा स्नेहा और दुर्गावती के बीच के रिश्ते में संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन स्नेहा को अपने स्वाभिमान और क़र्ज़ चुकाने के लिए संघर्ष करते देख, अब उसका नज़रिया बदल चूका है। अब गंगा का मानना है कि जो लोग आत्म-सम्मान और ईमानदारी से काम करते हैं उन्हें समाज से आलोचना नहीं बल्कि उन्हें प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
अब सवाल तो यह उठता है कि क्या दुर्गावती, गंगा की इन बातों को समझेगी या इसे गंगा के परिवार की तरफ से एक और चुनौती के रूप में देखेगी? चुनाव नज़दीक आ रहे हैं और स्नेहा भी अपने फैसले पर पूरी तरह अड़ी हुई है, इसलिए ठाकुर परिवार के भीतर की यह लड़ाई अब और ज्यादा गहरी होती जा रही है।
अब यह देखना बहुत ही दिलचस्प होगा कि क्या दुर्गावती आख़िरकार स्नेहा के काम करने के फैसले को मान लेगी या फिर यह पारिवारिक विवाद, दोनों परिवारों के बीच कभी न ख़त्म होने वाली दूरियां पैदा कर देगा?