उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?
उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं? भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जितना विशाल है, उतना ही जटिल भी। इस जटिलता के बीच दो वास्तविकताएँ आज …

उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जितना विशाल है, उतना ही जटिल भी। इस जटिलता के बीच दो वास्तविकताएँ आज हमारे सामने खड़ी हैं—पहली, भारत के 11 करोड़ से अधिक घुमन्तु, अर्धघुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजाति समुदाय (DNT/NT/SNT) जो पहचान, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य व मानवाधिकारों की बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं।दूसरी, LGBTQ+ समुदाय का मुद्दा, जिसकी जनसंख्या लगभग 5–6 लाख मानी जाती है, किन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसकी उपस्थिति अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही है। एक ओर विशाल आबादी है जो अदृश्य बनी हुई है, दूसरी ओर एक छोटा समुदाय वैश्विक एजेंडों और वित्तीय तंत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय बहस को प्रभावित कर रहा है। इस विरोधाभास ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है—क्या हमारे राष्ट्रीय मुद्दों पर वैश्विक एजेंडों का कब्जा हो रहा है?
भारत का जनजाति समाज: गौरव, संघर्ष और उपेक्षा
भारत की जनजातियाँ—चाहे अनुसूचित जनजाति हों या घुमन्तु–अर्धघुमन्तु समुदाय—हमेशा से भारतीय सभ्यता का अंग रही हैं। विवाह परम्परा, कृषि-कौशल, वन-ज्ञान, संगीत-नृत्य, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक स्वायत्तता—ये सभी भारतीय समाज के मूल स्वरूप से उत्पन्न हैं। लेकिन औपनिवेशिक दौर ने इनके परिचय में जान-बूझकर भ्रम पैदा किया। मैक्समूलर और मैकाले जैसे विद्वानों ने “Indigenous”, “Aboriginal”, “Tribe” जैसे विदेशी शब्द थोपे, जिससे भारतीय जनजाति समाज को ‘मुख्यधारा से अलग’ दिखाने का प्रपंच रचा गया। ब्रिटिश शासन के लिए इसका उद्देश्य स्पष्ट था—वन-संपदा, खनिज और भूमि पर अधिपत्य।
उद्योगों के विस्तार के लिए वन समुदायों के अधिकारों को कमजोर किया गया। Criminal Tribes Act 1871 जैसे कानूनों ने संपूर्ण समुदायों को अपराधी घोषित कर दिया—यह कलंक आज तक कई क्षेत्रों में सामाजिक व्यवहार का हिस्सा है।स्वतंत्र भारत में भी यह उपेक्षा समाप्त नहीं हुई। Renke Commission (2008) और Idate Commission (2018) के अनुसार:
* देश में 8–11 करोड़ घुमन्तु–डिनोटिफाइड जनजातियाँ
* अब तक एक भी जनगणना में अलग श्रेणी नहीं
* 70–80% के पास स्थायी पता, पहचान पत्र, आवास दस्तावेज़ नहीं
* सरकारी योजनाएँ इन तक पहुंच ही नहीं पातीं
* शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति बेहद दयनीय
* रोजगार और आजीविका के अवसर न्यूनतम
सवाल स्पष्ट है—जब 11 करोड़ आबादी अपनी बुनियादी पहचान तक से वंचित है, तब इसे राष्ट्रीय विमर्श में स्थान क्यों नहीं मिलता?
LGBTQ+ विमर्श का वैश्विक उत्थान: क्या यह भारत का प्राथमिक मुद्दा है?
यह स्वीकार करना अनिवार्य है कि LGBTQ+ व्यक्तियों को सम्मान, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए—यह किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए अनिवार्य है।
लेकिन मुद्दा यहाँ तुलना का है—
* LGBTQ+ अनुमानित जनसंख्या: 5–6 लाख
* DNT/NT/SNT तथा समान समुदाय: 8–11 करोड़
* राष्ट्रीय विमर्श में LGBTQ+ को मिलने वाला स्थान: अत्यधिक
* घुमन्तु समुदायों को मिलने वाला स्थान: नगण्य
तो ऐसा क्यों हो रहा है?
उत्तर मिलता है वैश्विक फंडिंग नेटवर्क में—
* Ford Foundation
* Open Society Foundations
* Rockefeller Network
* Human Rights Fund
* UNDP Inclusion Fund
* वैश्विक CSR तंत्र
ये संस्थाएँ भारतीय विश्वविद्यालयों, NGO नेटवर्क, मीडिया, सांस्कृतिक आयोजनों और डिजिटल अभियानों में भारी निवेश कर रही हैं—मुख्यतः LGBTQ+ और जेंडर-फ्लुइडिटी एजेंडा के विस्तार के लिए।
आँकड़े बताते हैं कि पिछले 5 वर्षों में LGBTQ+ आधारित कार्यक्रमों व उत्सवों में 200–400% तक वृद्धि हुई है—लिट फेस्ट, फिल्म फेस्टिवल, सोशल मीडिया कॉन्क्लेव, जेंडर डायलॉग्स आदि में।
यही समय अवधि है जिसमें घुमन्तु समाज पर एक भी राष्ट्रीय स्तर का आयोजन नहीं हुआ।
ब्रांडिंग बनाम वास्तविक मुद्दे: क्यों अलग हैं प्राथमिकताएँ?
सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि LGBTQ+ विषय—
* शहरी ब्रांडिंग के अनुकूल
* कॉर्पोरेट प्रगतिशीलता के मॉडल से मेल खाता
* पश्चिमी राजनीतिक एजेंडों के अनुरूप
* मीडिया-एलीट वर्ग के लिए प्रतिष्ठित
इसलिए इसे वित्तीय सहयोग और मंच उपलब्ध करवाना आसान है।
इसके विपरीत—
* घुमन्तु/डिनोटिफाइड जनजातियाँ न शहरी हैं
* न उनके पास सामाजिक-डिजिटल प्रभाव
* न वे बाजार या मीडिया के लिए “सेलिबल” हैं
* न उनकी कहानी वैश्विक विमर्श के अनुकूल है
अर्थात, वे ‘ब्रांड वैल्यू’ नहीं बन पातीं—इसीलिए विमर्श से बाहर हैं।
शिक्षा का असंतुलन: queer theory बनाम घुमन्तु इतिहास
पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख विश्वविद्यालयों ने—
* gender fluidity
* queer studies
* sexuality curriculum
को अपने पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया है।
वहीं दूसरी ओर—
* घुमन्तु जनजातियों का इतिहास
* उनकी परम्पराएँ
* कला, भाषा, संस्कृति
* औपनिवेशिक शोषण का वर्णन
इनमें से किसी पर कोई राष्ट्रीय स्तर का अकादमिक कार्यक्रम उपलब्ध नहीं।
इसका अर्थ स्पष्ट है—भारत की शिक्षा प्रणाली भी वैश्विक एजेंडों से प्रभावित हो रही है।
क्या असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा रहा है?
राष्ट्रीय विमर्श का असंतुलन केवल संयोग नहीं है। इसके पीछे तीन प्रमुख कारक दिखाई देते हैं—
1) कॉर्पोरेट-ग्लोबल एजेंडा
मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपनी ब्रांडाइजेशन में प्रगतिशीलता प्रदर्शित करना चाहती हैं—इसलिए LGBTQ+ विषय उनकी प्राथमिकता है।
2) विदेशी NGO तंत्र
यह तंत्र उन्हीं सामाजिक मुद्दों को उभारता है जो पश्चिमी दुनिया की “मॉडर्निटी” की परिभाषा से मेल खाते हों।
3) मीडिया-एलीट नेटवर्क
यह वर्ग उन मुद्दों को amplify करता है—
* जिनके पीछे फंडिंग हो
* जो शहरी प्रचलन से जुड़े हों
* जो ग्लोबल नैरेटिव में फिट बैठते हों
इसीलिए 11 करोड़ की समस्याएँ मौन रहती हैं और 5 लाख का विषय राष्ट्रीय विमर्श बन जाता है।
अंतिम प्रश्न: क्या भारत अपना विमर्श स्वयं लिखेगा?
भारत के सामने आज एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसर है—
कि वह अपने घुमन्तु–अर्धघुमन्तु–डिनोटिफाइड समुदायों को—
* पहचान
* वनाधिकार
* शिक्षा
* स्वास्थ्य
* पुनर्वास
* सांस्कृतिक स्वायत्तता
* सम्मान
दिलाने का राष्ट्रीय अभियान प्रारंभ करे।जब तक भारत का सार्वजनिक विमर्श बाहरी शक्तियों के प्रभाव में रहेगा, तब तक वास्तविक भारत—अपनी वास्तविक समस्याओं सहित—अंधेरे में ही रहेगा।जनजाति गौरव दिवस हमें स्मरण कराता है कि भारत की आत्मा उसके जनजातीय समाज में भी उतनी ही गहराई से बसती है जितनी उसकी मुख्यधारा में। अब समय है कि हम उपनिवेशकालीन भ्रमों और आधुनिक वैचारिक कुचक्रों से मुक्त होकर, भारत के 11 करोड़ अदृश्य नागरिकों को वह सम्मान और हक़ लौटाएँ जिसके वे वास्तविक हक़दार हैं।
-कैलाश चन्द्र
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।
लेखक के बारे में
Web Title: Marginalized populations vs. the global agenda: Why are the real issues being lost? BY KAILASH CHANDRA
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