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सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयंसेवकों का योगदान

सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयंसेवकों का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। इसमें अनेक संगठन, …

सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयंसेवकों का योगदान
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 08 Jun 2026 | 7:54 pmModified: 08 Jun 2026 | 7:54 pm
HIGHLIGHTS
  1. महान यज्ञ में अनेक ऐसे व्यक्तित्व और संगठन भी थे जिन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया, किंतु अपने कार्य का प्रचार या श्रेय लेने का आग्रह नहीं किया। "सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया" यह वाक्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति और उसके स्वयंसेवकों की कार्यसंस्कृति को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।
  2. स्वतंत्रता संग्राम में संघ परंपरा से जुड़े अनेक अन्य व्यक्तित्व भी उल्लेखनीय हैं। दैवी पंथ चौधरी, जगतपति कुमार, अण्णासाहब देशपांडे, रमाकांत केशव देशपांडे, वसंतराव ओक, नारायण सिंह, मुकुन्द हूद्दार, चंद्रकांत भारद्वाज, दादानाईक चिमूर, बाबूराव बेगड़े, लाला हंसराज तथा बालाजी रायपुरकर जैसे अनेक नाम स्वतंत्रता संघर्ष के विविध अध्यायों से जुड़े रहे।
  3. शेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ के अनेक प्रचारक और कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत गतिविधियों, जनसंपर्क, संगठन तथा आंदोलन के संचालन में जुड़े। उस समय संघ एक नवोदित संगठन था, फिर भी उसके स्वयंसेवकों ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए अपना योगदान दिया।

सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयंसेवकों का योगदान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। इसमें अनेक संगठन, विचारधाराएँ, क्रांतिकारी, समाजसुधारक और लाखों सामान्य नागरिक सम्मिलित रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के इस महान यज्ञ में अनेक ऐसे व्यक्तित्व और संगठन भी थे जिन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया, किंतु अपने कार्य का प्रचार या श्रेय लेने का आग्रह नहीं किया। "सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया" यह वाक्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति और उसके स्वयंसेवकों की कार्यसंस्कृति को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की। डॉ. हेडगेवार स्वयं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी थे। उन्हें अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलनों में भाग लेने के कारण दो बार एक-एक वर्ष का सश्रम कारावास भुगतना पड़ा। पहली बार असहयोग आंदोलन के दौरान और दूसरी बार सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतर्गत जंगल सत्याग्रह में सहभागिता के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। जंगल सत्याग्रह में संघ के लगभग 150 स्वयंसेवकों ने भी सक्रिय भागीदारी की थी। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि संघ का स्वतंत्रता संघर्ष से संबंध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष सहभागिता का भी था।

स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में संघ के अनेक स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से सक्रिय रहे। विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ के अनेक प्रचारक और कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत गतिविधियों, जनसंपर्क, संगठन तथा आंदोलन के संचालन में जुड़े। उस समय संघ एक नवोदित संगठन था, फिर भी उसके स्वयंसेवकों ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए अपना योगदान दिया।

स्वाधीनता संघर्ष के दौरान जिन स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई, उनमें राजस्थान के जयदेवजी पाठक का नाम उल्लेखनीय है, जो आगे चलकर विद्या भारती के कार्य में सक्रिय रहे। विदर्भ के आर्वी क्षेत्र में डॉ. अण्णासाहब देशपांडे ने राष्ट्रजागरण का महत्वपूर्ण कार्य किया।

छत्तीसगढ़ के जशपुर क्षेत्र में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे ने समाज जागरण और संगठन निर्माण का कार्य किया तथा आगे चलकर वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की, जिसने वनवासी समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दिल्ली में वसंतराव ओक ने स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड में महत्वपूर्ण कार्य किया। बाद में वे दिल्ली के प्रांत प्रचारक बने और संगठन विस्तार में उनका बड़ा योगदान रहा। बिहार में प्रसिद्ध अधिवक्ता कृष्ण वल्लभ प्रसाद नारायण सिंह, जिन्हें स्नेहपूर्वक "बबुआजी" कहा जाता था, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और बाद में बिहार के संघचालक बने। इसी प्रकार दिल्ली के चंद्रकांत भारद्वाज स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गोली लगने से घायल हुए। उनके पैर में धँसी गोली जीवनभर नहीं निकाली जा सकी। बाद में वे एक प्रसिद्ध कवि बने और अनेक प्रेरणादायी संघ गीतों की रचना की।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव देवड़े ने राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर वे प्रांत प्रचारक बने। मध्य प्रदेश के उज्जैन क्षेत्र में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे का भी स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान रहा। इन सभी कार्यकर्ताओं की विशेषता यह थी कि उन्होंने राष्ट्रकार्य को व्यक्तिगत यश और प्रसिद्धि से ऊपर रखा।
स्वतंत्रता संग्राम में संघ परंपरा से जुड़े अनेक अन्य व्यक्तित्व भी उल्लेखनीय हैं। दैवी पंथ चौधरी, जगतपति कुमार, अण्णासाहब देशपांडे, रमाकांत केशव देशपांडे, वसंतराव ओक, नारायण सिंह, मुकुन्द हूद्दार, चंद्रकांत भारद्वाज, दादानाईक चिमूर, बाबूराव बेगड़े, लाला हंसराज तथा बालाजी रायपुरकर जैसे अनेक नाम स्वतंत्रता संघर्ष के विविध अध्यायों से जुड़े रहे। इनमें से कई व्यक्तित्वों ने जेल यात्राएँ कीं, अनेक ने संगठनात्मक कार्य संभाला और कुछ ने प्रत्यक्ष संघर्षों में भाग लेकर राष्ट्रीय चेतना को सशक्त बनाया।

विशेष रूप से हेमू कालाणी का बलिदान भारतीय युवाशक्ति के साहस का अनुपम उदाहरण है। सिंध के इस युवा क्रांतिकारी ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसी प्रकार राजाभाऊ महाकाल का बलिदान भी राष्ट्रभक्ति और त्याग का प्रेरक प्रसंग है। इनका स्मरण हमें यह बताता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि अनगिनत बलिदानों की परिणति थी।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी राष्ट्रीय एकीकरण का कार्य समाप्त नहीं हुआ था। गोवा, दमन और दीव अभी भी पुर्तगाली शासन के अधीन थे। इन क्षेत्रों की मुक्ति के लिए चले आंदोलनों में भी अनेक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। मास्टर गोविंद तथा मोहन रानाडे जैसे कार्यकर्ताओं ने गोवा मुक्ति आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। यह संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता की अवधारणा केवल 1947 तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत की पूर्ण राष्ट्रीय एकता और अखंडता तक विस्तारित थी।

संघ की कार्यपद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की बजाय राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का संस्कार दिया। संघ के स्वयंसेवकों ने अनेक क्षेत्रों में कार्य किया, परंतु अधिकांश ने अपने योगदान का प्रचार नहीं किया। उनका विश्वास था कि यदि समाज जागृत और संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेगा। इसीलिए संघ की परंपरा में श्रेय प्राप्ति की अपेक्षा कर्तव्यपालन को अधिक महत्व दिया गया।

आज जब सार्वजनिक जीवन में छवि-निर्माण, प्रचार और त्वरित प्रसिद्धि को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, तब "सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया" का आदर्श विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह दृष्टिकोण बताता है कि राष्ट्रनिर्माण का कार्य किसी एक व्यक्ति या संगठन का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक दायित्व है। जो व्यक्ति या संगठन समाज को संगठित कर, प्रेरित कर और आगे बढ़ाकर स्वयं पीछे रहने की क्षमता रखता है, वही दीर्घकालीन परिवर्तन का आधार बनता है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन करते समय आवश्यक है कि हम उसके सभी आयामों को समझें। यह इतिहास केवल प्रसिद्ध नेताओं का इतिहास नहीं है; यह उन हजारों ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं का भी इतिहास है जिन्होंने राष्ट्रहित में अपना सर्वस्व समर्पित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके स्वयंसेवकों का योगदान भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उनके कार्यों का मूल संदेश यही था कि राष्ट्र सर्वोपरि है, समाज ही शक्ति का स्रोत है, और सेवा का सर्वोच्च रूप वह है जिसमें सहभागिता तो हो, परंतु श्रेय की अपेक्षा न हो।
"सहभाग किया, श्रेय नहीं लिया" केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्रजीवन में विनम्रता, समर्पण, संगठन और कर्तव्यनिष्ठा का एक स्थायी आदर्श है। यही आदर्श स्वतंत्रता संग्राम के अनेक स्वयंसेवकों के जीवन में दिखाई देता है और यही आदर्श आज भी राष्ट्रनिर्माण की दिशा में प्रेरणा प्रदान करता है।

—कैलाश चन्द्र
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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Web Title: Participated, not taken credit: The contribution of the Rashtriya Swayamsevak Sangh and its volunteers to the Indian freedom struggle article by KAILASHCHANDRA

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