(अमनप्रीत सिंह)
बेंगलुरु, पांच फरवरी (भाषा) एक समय भारत के बेहतरीन एकल खिलाड़ियों में गिने जाने वाले युकी भांबरी का करियर एक अप्रत्याशित लेकिन सीखने वाला सफर रहा है।
एटीपी रैंकिंग में शीर्ष 100 में आने के तुरंत बाद चोटों ने उनके एकल करियर को रोक दिया। प्रायोजन की अनिश्चितता ने चुनौतियों को और बढ़ा दिया और जो उम्मीदें लोगों ने देखीं थी वे उस प्रारूप में काफी हद तक अधूरी रह गईं।
युकी खुद को भारत के शीर्ष युगल खिलाड़ी के तौर पर अपने पेशेवर जीवन के सबसे सफल दौर में पाते हैं। पिछले 18 महीने में उन्होंने चार एटीपी खिताब जीते, एक ग्रैंडस्लैम सेमीफाइनल खेला और यह इस बात का एक उदाहरण है कि ढांचागत समर्थन एलीट स्तर के प्रतिभावान खिलाड़ी के लिए क्या कर सकता है।
पीटीआई के साथ एक बातचीत में युकी ने इस विचार का विरोध किया कि युगल सिर्फ एक सांत्वना देने वाला काम है। इस बात पर विचार किया कि क्या उनका एकल करियर अलग हो सकता था और चेतावनी दी कि अगर जल्द ही व्यवस्था में बदलाव नहीं किए गए तो चीन और जापान जैसे देशों से भारत और पीछे रह जाएगा।
एक ऐसे खेल में जहां एकल प्रारूप को अधिक अहमियत मिलती है वहां युकी का कहना है कि युगल को दूसरा विकल्प या दूसरे दर्जे (साइड शो) की तरह देखना बंद करना चाहिए।
नीदरलैंड के खिलाफ डेविस कप मुकाबले से पहले युकी ने कहा, ‘‘जब हम बड़े होते हैं तो हर कोई एकल ग्रैंडस्लैम चैंपियन बनना चाहता है, इसमें कोई शक नहीं। यह मेरा भी सपना था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन युगल इसलिए मौजूद है क्योंकि इसका एक बाजार है। लोग इसे देखना चाहते हैं और इसमें सफल होने के लिए उत्कृष्ट होना जरूरी है।’’
क्रिकेट के कई प्रारूप से तुलना करते हुए युकी का तर्क है कि टेनिस को भी अलग-अलग प्रारूप को अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘क्रिकेट टेस्ट विशेषज्ञों, एकदिवसीय खिलाड़ियों और टी20 स्टार्स का जश्न मनाता है। टेनिस में एकल और युगल हैं। यह एक ही खेल है। बस प्रारूप अलग है। एक प्रारूप का अपमान सिर्फ इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि दूसरा मौजूद है।’’
युकी ने पिछले साल के एटीपी 500 दुबई चैंपियनशिप सहित चार एटीपी खिताब जीते और ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट में बेहतर प्रदर्शन किया और यह उस समय हुआ जब ‘डबल्स ड्रीम प्रोजेक्ट’ शुरू किया। यह एक ऐसी पहल है जो भारत के शीर्ष युगल खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय कोचिंग, ट्रेनर, विश्लेषक और साजो-सामान से जुड़ा समर्थन देती है।
देश के टेनिस में यह एक कभी नहीं खत्म होने वाली बहस रही है कि क्या भारतीय खिलाड़ी देर से अपने खेल के शीर्ष पर पहुंचते हैं। आखिर नतीजे तो यही बताते हैं।
तैंतीस साल के युकी ने इस पर अपनी राय रखते हुए कहा, ‘‘हम देर से अपने खेल के शीर्ष पर पहुंचते हैं। लेकिन मेरी राय में इसका कारण यह है कि मुझे लगता है कि हम खेल को देर से समझते हैं। जो ज्ञान हमें मिलता है, वह देर से मिलता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है कि हम भारतीय कड़ी मेहनत नहीं करते। हम किसी भी क्षेत्र में दुनिया में सबसे ज्यादा मेहनती हैं। चाहे वह खेल हो या नौकरी। यहां तक कि भारतीय बच्चे भी बहुत कड़ी मेहनत करते हैं। हमारे पास बस वह सब नहीं है जो एक विश्व स्तरीय चैंपियन बनने के लिए जरूरी है।’’
यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या युकी का एकल करियर अलग तरह से आगे बढ़ सकता था?
युकी ने कहा, ‘‘शायद। चोटों ने बड़ी भूमिका निभाई लेकिन सही मार्गदर्शन भी चोटों को रोकने और करियर का बेहतर ढंग से प्रबंध करने में मदद करता है।’’
युकी कहते हैं कि भारत पहले से ही एशियाई प्रतिद्वंद्वियों से पीछे चल रहा है जिन्होंने ढांचागत विकास में बहुत अधिक निवेश किया है।
युकी ने कहा, ‘‘जब मैं वर्षों पहले पहली बार चीन गया था तो उनका पुरुषों का टेनिस मजबूत नहीं था। आज उनके पास ग्रैंडस्लैम के प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी, ओलंपिक चैंपियन और पुरुषों तथा महिलाओं दोनों के टेनिस में कई शीर्ष 200 में शामिल खिलाड़ी हैं।’’
उन्होंने कहा कि जापान लंबे समय से लगातार अच्छे पेशेवर खिलाड़ी तैयार करता रहा है लेकिन पिछले एक दशक में चीन का उदय तेजी से हुआ है।
सोमदेव देववर्मन और पूरव राजा द्वारा अखिल भारतीय टेनिस संघ (एआईटीए) के संचालन और कामकाज को चुनौती देने वाली याचिका के बारे में पूछे जाने पर युकी ने कहा कि इसका मकसद सुधार था, टकराव नहीं।
उन्होंने कहा, ‘‘इसका मकसद व्यवस्था को हिलाना था। मुझे नहीं लगता कि किसी ने सोचा होगा कि यह इतने लंबे समय तक फंसा रहेगा।’’
भाषा सुधीर मोना
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