हॉकी विश्व कप के प्रारूप को लेकर टीमों से लेकर मीडिया तक सभी हैरान परेशान
हॉकी विश्व कप के प्रारूप को लेकर टीमों से लेकर मीडिया तक सभी हैरान परेशान
(मोना पार्थसारथी)
एम्सटेलवीन, 23 अगस्त (भाषा) विश्व कप में टीमों के प्रदर्शन की समीक्षा की बजाय उनके सेमीफाइनल में पहुंचने की संभावनाओं का गणित लगा रहे मीडिया और प्रशंसकों के जेहन में एक ही सवाल है कि पारंपरिक नॉकआउट क्वार्टर फाइनल और फिर सेमीफाइनल की बजाय प्रारूप में बदलाव करके इसे पेचीदा बनाने की क्या जरूरत थी ।
मसलन भारतीय पुरूष हॉकी टीम का सेमीफाइनल में पहुंचना अभी अगर मगर के फेर में फंसा हुआ है । इंग्लैंड को अर्जेंटीना से हारने के बाद भी पहले दौर के तीन अंक मिले हुए हैं । भारत को इंग्लैंड से दूसरे दौर में नहीं खेलना है लिहाजा उसके पास दो ही मैच थे जिसमें से वह पहला नीदरलैंड से हार चुका है । इसके बावजूद तकनीकी तौर पर उसे अभी बाहर नहीं कहा जा सकता ।
इस तरह की पेचीदगियां अन्य टीमों के साथ भी है जिसने मीडिया को तो हैरान परेशान कर ही रखा है, साथ ही प्रशंसकों को ‘क्वार्टर फाइनल’ के रोमांच से भी वंचित कर दिया । एफआईएच रैकिंग में नीचे काबिज कई टीमों को लगता है कि यह प्रारूप छोटी टीमों के साथ न्याय नहीं करता।
चिली महिला हॉकी टीम की कप्तान 34 वर्ष की स्ट्राइकर मैनुअला उरोज ने भाषा से कहा ,‘‘दुर्भाग्य से यह हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ प्रारूप नहीं था । इसे लेकर क्या कहूं , समझ में नहीं आता । कुछ टीमों को यह सही लगता है और कुछ को गलत । लेकिन हमें नियम पता हैं और अच्छा खेलना है बस ।’
उन्होंने कहा ,‘‘ पिछले विश्व कप में भी प्रारूप अलग था जिसे समझना मुश्किल था । अगर एफआईएच को लगा कि यही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है तो नये प्रारूप को लागू किया गया ।’’
विश्व कप की मेजबान और विजेता रह चुकी एक अन्य टीम के कोच ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा ,‘‘ यह प्रारूप बड़ी टीमों को ही बढावा देता है । अगर वे पहले दौर में जीते हैं तो दूसरे दौर में भी उनके पास आगे जाने के लिये अंक हैं । इसमें अब दूसरे दौर में नॉकआउट के जीत हार के रोमांच की बजाय समीकरणों का गणित अहम हो गया है । इससे खेल का मजा भी कम हो गया है ।’’
दक्षिण अफ्रीका महिला टीम कोच जोंडी इनोकी ने कहा ,‘‘यह बहुत चुनौतीपूर्ण प्रारूप है । इस समय विश्व हॉकी दो भागों में बंटी हुई है और पहले हिस्से में शीर्ष आठ नौ टीमें आती हैं जबकि दूसरे हिस्से में हमारे जैसी टीमें हैं । हमें इसका बहुत अनुभव करना पड़ता है । ’’
उन्होंने आगे कहा ,‘‘ लेकिन हमें सिर्फ सकारात्मक चीजों पर ध्यान देना है और उम्मीद है कि इस प्रारूप से यह संवाद बढेगा कि भविष्य में बेहतर टूर्नामेंट कैसे आयोजित हों । ’’
वहीं जापान के कोच ताकाहाशी अकीरा ने दुभाषिये की मदद से कहा ,‘‘ हमारी कोई शिकायत नहीं है लेकिन सभी टीमों को आगे बढने का बराबरी से मौका मिलता तो और बेहतर होता ।’’
नीदरलैंड में एक वेबसाइट के लिये काम करने वाले अनुभवी हॉकी पत्रकार रेमन मिन ने कहा कि दूसरे दौर में इतना ज्यादा गणित करना पड़ रहा है कि टीमों के प्रदर्शन, रणनीति और खेल पर से ध्यान हट गया है जो सही नहीं है ।
उन्होंने कहा ,‘‘यहां मीडिया सेंटर में बैठकर काफी गणना करनी पड़ रही है क्योंकि इतने सारे विकल्प सामने हैं । यह बहुत ज्यादा हो गया है जिससे फोकस उन चीजों से हट गया है जो मैच में अहम है । दर्शकों के लिये भी इसे समझना मुश्किल है क्योंकि उन्हें नॉकआउट की आदत है । अब इस प्रारूप के लिये इंटरनेट पर पढकर आना पड़ेगा वरना उसे समझ में नहीं आयेगा और मुझे नहीं लगता कि किसी के पास इतना टाइम है ।’’
भारतीय कोचों शोर्ड मारिन और क्रेग फुल्टोन ने टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही कहा था कि व्यक्तिगत तौर पर उनकी पसंद क्वार्टर फाइनल वाला प्रारूप है क्योंकि वे टूर्नामेंट के सबसे रोमांचक मैच होते हैं ।
एफआईएच से नये प्रारूप पर टिप्पणी के लिये बार बार प्रयास के बावजूद संपर्क नहीं हो सका ।
भाषा मोना नमिता
नमिता

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