ओडिशा ओपन की पुरस्कार राशि न मिलने पर गुप्ता ने खेल मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया

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ओडिशा ओपन की पुरस्कार राशि न मिलने पर गुप्ता ने खेल मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया

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  • Publish Date - May 9, 2026 / 02:52 PM IST,
    Updated On - May 9, 2026 / 02:52 PM IST

नयी दिल्ली, नौ मई (भाषा) भारतीय ग्रैंडमास्टर अभिजीत गुप्ता ने इस साल की शुरुआत में ओडिशा ओपन शतरंज टूर्नामेंट की खिताबी पुरस्कार राशि नहीं मिलने पर निराशा व्यक्त की और खेल मंत्रालय से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।

अभिजीत ने इस संबंध में अखिल भारतीय शतरंज महासंघ (एआईसीएफ) को भी पत्र लिखा था लेकिन उनकी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई और उन्हें पुरस्कार राशि नहीं मिली। इस कारण उन्हें अब खेल मंत्रालय से हस्तक्षेप की गुहार लगानी पड़ी है। सूत्रों के अनुसार ओडिशा शतरंज संघ में आंतरिक कलह चल रहा है और उसका बैंक खाता फ्रीज हो गया है, जिससे आयोजक बकाया राशि का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं।

अभिजीत ने एक्स पर लिखा, ‘‘मैं खेल मंत्रालय से विनम्र अनुरोध करता हूं कि वह इस मामले पर गौर करे और यह सुनिश्चित करने में मदद करे कि खिलाड़ियों को पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ उनकी उचित पुरस्कार राशि मिले।’’

उन्होंने कहा, ‘‘यह केवल एक पुरस्कार राशि का मामला नहीं है। यह भारत के प्रत्येक शतरंज खिलाड़ी की गरिमा और विश्वास से जुड़ा मामला भी है।’’

अभिजीत ने जनवरी में यह प्रतियोगिता जीती थी और उनका दावा है कि आयोजकों पर उनका 5.5 लाख रुपये का बकाया है।

उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘‘मैंने इस साल जनवरी में ओडिशा ओपन का खिताब जीता था। आयोजकों ने मुझे आश्वासन दिया था कि पुरस्कार राशि एक महीने के अंदर भुगतान कर दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद जब मैंने उनसे इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने जवाब देना बंद कर दिया।’’

अभिजीत ने कहा, ‘‘जीत और हार एक खिलाड़ी के सफर का हिस्सा हैं लेकिन दुख तब होता है जब आप जीत जाते हैं और फिर भी आपको वह नहीं मिलता जिसके आप हकदार हैं।’’

एआईसीएफ के एक सूत्र ने बताया कि ओडिशा ओपन के आयोजक गुप्ता को भुगतान नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि राज्य संघ के भीतर चल रहे आंतरिक कलह के कारण उनका बैंक खाता फ्रीज कर दिया गया था।

सूत्र ने बताया, ‘‘राज्य संघ के भीतर आपसी कलह चल रही है, प्रतिद्वंद्वी गुट आपस में विवाद में उलझे हुए हैं, जिसके कारण खाता फ्रीज कर दिया गया है और खिलाड़ियों को उनका बकाया नहीं मिल रहा है।’’

भाषा

पंत मोना

मोना