भारत को 10 मीटर एयर राइफल व्यक्तिगत स्पर्धा में दो पदक, निशानेबाजी में पदकों की संख्या पांच हुई

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भारत को 10 मीटर एयर राइफल व्यक्तिगत स्पर्धा में दो पदक, निशानेबाजी में पदकों की संख्या पांच हुई

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  • Publish Date - September 21, 2026 / 01:27 PM IST,
    Updated On - September 21, 2026 / 01:27 PM IST

(अजय मसंद)

नागोया, 21 सितंबर (भाषा) युवा निशानेबाज हिमांशु ढिल्लों और रुद्रांक्ष पाटिल ने रोमांचक मुकाबले में दबाव के बीच संयम बनाए रखते हुए सोमवार को यहां एशियाई खेलों में पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल व्यक्तिगत स्पर्धा में क्रमश: रजत और कांस्य पदक जीता जबकि दोनों ने पार्थ माने के साथ मिलकर टीम स्पर्धा का रजत पदक भी अपने नाम किया।

इन तीन पदक से निशानेबाजी में भारत की पदक संख्या पांच हो गई है जिसमें चार रजत और एक कांस्य शामिल है। हालांकि एक बार फिर चीन के पेरिस ओलंपिक के दोहरे स्वर्ण पदक विजेता लिहाओ शेंग को कोई पीछे नहीं छोड़ सका। विश्व के नंबर एक निशानेबाज ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता।

शेंग ने 254.2 अंक के खेलों के और एशियाई रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया। सोमवार को अपना 21वां जन्मदिन मना रहे हिमांशु ने 252.4 अंक के साथ रजत जीता। रुद्रांक्ष ने 230.9 अंक हासिल किए। मजबूत शुरुआत के बाद वह स्वर्ण पदक की चुनौती पेश करते दिख रहे थे लेकिन अंततः तीसरे स्थान पर रहे।

व्यक्तिगत ढिल्लों, अपने पहले एशियाई खेल में हिस्सा ले रहे रुद्रांक्ष और 18 वर्षीय माने के टीम स्पर्धा में रजत पदक जीतने के महज एक घंटे बाद आए।

चीन ने एक बार फिर मानक स्थापित किया। शेंग, झांग चांगहोंग और मा सिहान की चीन की तिकड़ी ने 1899.0 अंक जुटाकर पिछले साल काहिरा में बनाए अपने 1898.4 अंक के विश्व रिकॉर्ड में सुधार किया। दक्षिण कोरिया ने 1884.2 अंक के साथ कांस्य जीता जबकि भारत के 1890.1 अंक रहे।

व्यक्तिगत फाइनल की कहानी कुछ अलग थी। इसमें ढिल्लों और रुद्रांक्ष के बीच रजत और कांस्य पदकों के लिए कड़ा मुकाबला हुआ जबकि शेंग लगातार बढ़त मजबूत करते गए।

रुद्रांक्ष शुरुआत में चीन के स्टार को चुनौती देने वाले भारतीय निशानेबाज के तौर पर आगे नजर आए। दूसरी सीरीज के बाद 2022 विश्व चैंपियन रुद्रांक्ष के कुल 106.0 अंक थे और वह शेंग से 1.1 अंक आगे थे। हिमांशु के 104.8 अंक थे।

हालांकि एलिमिनेशन सीरीज में स्थिति बदल गई।

रुद्रांक्ष ने 9.7 का निशाना लगाया जबकि ढिल्लों ने 10.6 अंक हासिल कर 24 शॉट के फाइनल के 22वें शॉट के बाद दूसरा स्थान हासिल कर लिया। पदार्पण कर रहे ढिल्लों ने अपने काफी अनुभवी साथी पर 0.1 अंक की बढ़त बना ली।

यह प्रदर्शन निशानेबाजी कौशल के साथ-साथ उनके मानसिक संयम का भी नतीजा था।

ढिल्लों ने अपने पिता के कहने पर एक साल गुरुकुल में बिताया था और उनका कहना है कि इस अनुभव ने उन्हें अनुशासन सिखाया। निशानेबाजी को अपना लक्ष्य बनाने से पहले उन्होंने कुछ समय कुश्ती भी की थी।

हिमांशु ने कहा, ‘‘हां, अखाड़े पर बिताए थोड़े समय ने मुझे आखिरी निशाने तक लड़ने में मदद की।’’

उन्होंने वास्तव में आखिरी शॉट तक मुकाबला किया।

रुद्रांक्ष के दबाव के बावजूद और बेहद मामूली अंतर से रजत पदक दांव पर होने के बीच ढिल्लों ने संयम बनाए रखा। उन्हें अपने पहले एशियाई खेल में रजत पदक और टीम स्पर्धा के बाद दूसरा पदक मिला।

हरियाणा के इस निशानेबाज की नजर अब इस साल के अंत में होने वाली विश्व चैंपियनशिप पर है जहां वह 2028 लॉस एंजिलिस ओलंपिक के लिए कोटा स्थान हासिल करना चाहते हैं।

भारत के लिए टीम स्पर्धा का रजत पदक उसकी राइफल निशानेबाजी में उभरती गहराई का संकेत पहले ही दे चुका था।

रुद्रांक्ष ने व्यक्तिगत क्वालीफिकेशन में 631.8 अंक के साथ तीसरा और ढिल्लों ने 630.0 अंक के साथ सातवां स्थान हासिल किया। माने ने 628.3 अंक जुटाए और शीर्ष आठ में जगह नहीं बना सके जिससे वह व्यक्तिगत फाइनल में पहुंचने से मामूली अंतर से चूक गए।

हालांकि माने का योगदान किसी भी तरह मामूली नहीं था।

महज 18 वर्ष की उम्र में अपने पहले एशियाई खेलों में हिस्सा ले रहे जूनियर विश्व पदक विजेता माने ने दबाव में शानदार संयम दिखाया। टीम स्पर्धा का फैसला संयुक्त क्वालीफिकेशन स्कोर के आधार पर हुआ और उनके प्रदर्शन ने इसमें अहम भूमिका निभाई।

नवंबर में 19 वर्ष के होने वाले माने ने कहा, ‘‘आज की प्रतियोगिता दबाव के लिहाज से सीखने का बहुत बड़ा अनुभव रही। मैं अपनी प्रक्रिया पर कायम रहा और खुश हूं कि मैं टीम के पदक में योगदान दे सका।’’

इस किशोर के लिए यह पदक उस सफर का शानदार परिणाम भी है जो लगभग संयोग से शुरू हुआ था।

सोलापुर में जन्मे और पले-बढ़े माने को 13 साल की उम्र में निशानेबाजी से परिचित कराया गया। उनके पुलिस अधिकारी पिता ने उन्हें स्कूल में आयोजित ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया था।

जो शुरुआत में एक प्रयोग के तौर पर शुरू हुआ था वह धीरे-धीरे गंभीर लक्ष्य में बदल गया। बेहतर सुविधाओं के लिए उनका परिवार मुंबई आ गया जहां उन्होंने ओलंपियन और कोच सुमा शिरूर के साथ प्रशिक्षण लिया।

उनके पहले एशियाई खेल ने उन्हें टीम रजत पदक दिलाया।

माने के सामने अब एक और चुनौती है। वह मंगलवार को मिश्रित टीम स्पर्धा में इलावेनिल वलारिवन के साथ जोड़ी बनाएंगे।

भाषा सुधीर मोना

मोना