सहयोगी स्टाफ को लेकर अनिश्चितता से पैरा साइकिलिस्ट लीशा दास भावनात्मक तनाव में
सहयोगी स्टाफ को लेकर अनिश्चितता से पैरा साइकिलिस्ट लीशा दास भावनात्मक तनाव में
नयी दिल्ली, 23 जुलाई (भाषा) भारत की राष्ट्रमंडल खेलों की पैरा-साइकिलिंग स्पर्धा की एकमात्र प्रतिनिधि 16 वर्षीय लीशा दास ने अपने सहयोगी स्टाफ और ग्लास्गो यात्रा व्यवस्था को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण ‘भावनात्मक तनाव’ का हवाला देते हुए शीर्ष खेल अधिकारियों को पत्र लिखा है।
लीशा ने भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए), भारतीय साइकिलिंग महासंघ (सीएफआई), भारतीय पैरालंपिक समिति (पीसीआई) और खेल मंत्रालय के अधिकारियों को पत्र लिखा है।
राष्ट्रमंडल खेलों का उद्घाटन समारोह बृहस्पतिवार रात आयोजित होगा। लीशा का कहना है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने उन पर भारी मानसिक दबाव डाल दिया है क्योंकि वह अपने सहयोगी दल – निजी कोच आदित्य मेहता, महिला फिजियोथेरेपिस्ट डॉ आशा शेख और एक अनुभवी पैरा-साइकिलिंग तकनीशियन – की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं।
बार-बार अनुरोध और अदालत के हस्तक्षेप के बाद डॉ शेख की यात्रा को मंजूरी मिल गई, लेकिन मेहता की यात्रा और मान्यता पत्र (एक्रिडिटेशन) को लेकर अब भी कोई स्पष्टता नहीं है।
इसके बजाय अधिकारियों ने के दत्तात्रय को तकनीशियन और कोच के रूप में भेजने का प्रस्ताव रखा है जबकि उन्हें पहले ही लीशा की सहयोगी टीम के सदस्य के रूप में अस्वीकार किया जा चुका था।
लीशा ने विशेष रूप से मेहता को अपने कोच के रूप में साथ भेजने का अनुरोध किया था, जिसे शुरुआत में स्वीकार भी कर लिया गया था। हालांकि, उनका कहना है कि उसके बाद उनकी यात्रा व्यवस्था को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई।
बृहस्पतिवार को मंत्रालय, सीएफआई, पीसीआई और आईओए के अधिकारियों को भेजे गए ईमेल में लीशा ने लिखा, ‘‘मैं यह ईमेल अत्यंत भारी मन और गहरे भावनात्मक तनाव के साथ लिख रही हूं। एक खिलाड़ी के रूप में मेरी एकमात्र जिम्मेदारी अपनी ट्रेनिंग पर ध्यान देना और अपने देश का सर्वश्रेष्ठ तरीके से प्रतिनिधित्व करने की तैयारी करना होना चाहिए। लेकिन 15 मई से मैं लगातार संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर रही हूं और राष्ट्रमंडल खेल में मेरी भागीदारी तथा यात्रा व्यवस्था को लेकर स्पष्टता और सहयोग मांग रही हूं। ’’
उन्होंने लिखा, ‘‘मैंने अपनी वर्षों की ट्रेनिंग, उपकरण, तैयारी और क्वालीफिकेशन के लिए कभी वित्तीय सहायता नहीं मांगी। मेरे कोच (आदित्य मेहता) और उनके संगठन ने स्वतंत्र रूप से मेरी ट्रेनिंग, उपकरण और तैयारी में व्यापक सहयोग दिया है। बार-बार संपर्क और याद दिलाने के बावजूद मुझे स्पष्टता मिलने के बजाय लगातार अनिश्चितता और भारी मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा है। ’’
इस महीने की शुरुआत में पीटीआई ने सबसे पहले लीशा की इस समस्या को बताया था।
अब आदित्य मेहता ने पूरे सहयोगी दल की जिम्मेदारी स्वयं उठाने और आवश्यक सहायता की व्यवस्था अपने स्तर पर करने का निर्णय लिया है।
मेहता ने कहा, ‘‘लीशा भारत की सबसे कम उम्र की और पहली पैरा-साइकिलिस्ट हैं जिन्होंने राष्ट्रमंडल खेल के लिए क्वालीफाई किया है। वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला पैरा-साइकिलिस्ट भी हैं। लेकिन देश का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी करने के बजाय इस युवा खिलाड़ी को प्रशासनिक लड़ाई लड़नी पड़ रही है। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन वह हार नहीं मानेगी। लीशा पूरे दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ेगी। ’’
लीशा ने अपने ईमेल में लिखा, ‘‘कल फिर अधिकारियों ने मेरे कोच के फोन पर वीडियो कॉल के माध्यम से मुझसे संपर्क किया। मैंने स्पष्ट रूप से कहा कि मैं नाबालिग हूं और मेरे कोच तथा डॉ शेख ही मेरे अभिभावक और सहयोगी हैं जो मेरे प्रशिक्षण, देखभाल और तैयारी से सीधे जुड़े रहे हैं। ’’
उन्होंने लिखा, ‘‘मैंने अनुरोध किया कि मुझसे संबंधित किसी भी विषय पर सीधे उन्हीं से बात की जाए। ’’
उन्होंने लिखा, ‘‘मैं अपनी ट्रेनिंग और प्रतियोगिता पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश कर रही हूं। लेकिन लगातार अनिश्चितता, फोन कॉल, संदेश और प्रशासनिक बाधाओं ने ऐसे समय में मुझ पर अत्यधिक तनाव डाल दिया है, जब मुझे प्रतियोगिता की तैयारी कर देश के लिए पदक जीतने पर ध्यान देना चाहिए। ’’
लीशा ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय की कार्रवाई और दस्तावेजों में आदित्य मेहता को उनका कोच दर्ज किया गया है।
उन्होंने लिखा, ‘‘उच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद मुझे अपने कोच और सहयोगी टीम के मुद्दे पर लगातार अनिश्चितता, बार-बार संपर्क और मानसिक उत्पीड़न जैसा महसूस हो रहा है। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘ अगर के दत्तात्रय को तकनीशियन के रूप में भेजा जाता है तो मुझे उनकी उस भूमिका पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन कोच आदित्य मेहता का मेरे साथ कोच के रूप में होना आवश्यक है, साथ ही जरूरत पड़ने पर तकनीशियन या अन्य सहयोगी स्टाफ भी। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘तकनीशियन और कोच की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां अलग-अलग होती हैं। उन्हें एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता। ’’
उन्होंने चेताया कि अगर उनके कोच को उनके साथ जाने की अनुमति नहीं दी गई, तो वह भारत सरकार, भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ), पीसीआई या सीएफआई के बैनर या वित्तीय सहायता के तहत यात्रा नहीं करेंगी।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपनी यात्रा की व्यवस्था स्वयं करूंगी और अपने खर्च पर यात्रा करूंगी। ’’
अंत में लीशा ने कहा कि उन्हें इस स्तर तक पहुंचने के लिए प्रतियोगिताओं, उपकरणों और तैयारी के दौरान भारत सरकार, साइ, पीसीआई या सीएफआई से कोई सार्थक सहयोग नहीं मिला।
उन्होंने अनुरोध करते हुए कहा, ‘‘मैं अनुरोध करती हूं कि संबंधित संगठन मेरी उपलब्धियों का श्रेय नहीं लें। साथ ही, मेरी अनुमति के बिना मेरे फोटो या व्यक्तिगत तस्वीरों का प्रचार या प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से उपयोग नहीं किया जाए। ’’
भाषा नमिता सुधीर
सुधीर

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