खेल संगठनों को मान्यता देने से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं: शीर्ष अदालत

खेल संगठनों को मान्यता देने से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं: शीर्ष अदालत

खेल संगठनों को मान्यता देने से पहले दिल्ली उच्च न्यायालय की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं: शीर्ष अदालत
Modified Date: November 29, 2022 / 08:22 pm IST
Published Date: September 17, 2020 10:33 am IST

नयी दिल्ली, 17 सितंबर (भाषा) केन्द्र और भारतीय ओलंपिक संघ को बृहस्पतिवार को उस समय बड़ी राहत मिली जब उच्चतम न्यायालय ने कहा कि देश में विभिन्न खेल महासंघों को मान्यता देने से पहले उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय से अनुमति देने की जरूरत नहीं है।

न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ खेल मंत्रालय की अपील पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

उच्च न्यायालय ने उसकी सहमति के बगैर राष्ट्रीय खेल महासंघों को मान्यता देने पर पाबंदी लगा दी थी।

अदालत ने यह आदेश यह आदेश अधिवक्ता राहुल मेहरा की 2010 से लंबित जनहित याचिका पर यह आदेश दिया था। मेहरा ने राष्ट्रीय खेल संहिता का पालन करने और खेल मंत्रालय तथा भारतीय ओलंपिक संघ को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था कि राष्ट्रीय खेल महासंघ अपने कर्तव्यों का प्रदर्शन भी करें।

पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय खेल संहिता के तहत विभिन्न खेल महासंघां को मान्यता प्रदान करने से पहले केन्द्र को उच्च न्यायालय की सहमति देने की आवश्यकता नहीं है।

वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि मान्यता प्रदान नहीं किये जाने से अगर कोई भी प्रभावित है तो अदालत जा सकते हैं।

केन्द्र के वकील ने पीठ से कहाकि देश में अनेक महासंघ हैं और अगर किसी भी महासंघ को मान्यता देने से पहले उच्च न्यायालय की अनुमति लेनी होगी तो यह प्रक्रिया ही ठहर जायेगी।

सरकार का यह भी तर्क था कि मान्यता देने का मामला पूरी तरह से कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और उच्च न्यायालय को इसमें दखल नहीं देना चाहिए था।

शीर्ष अदालत ने इस तथ्य का संज्ञान लिया कि जनहित यचिका 2010 से उच्च न्यायालय में लंबित है और उसने अनुरोध किया कि इस यचिका का जल्द से जल्दी निस्तारण किया जाये।

भाषा अनूप

अनूप मोना

मोना


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