जिस नाम पर लोग हंसते थे, उसी झंडू ने कांस्य जीतकर बढ़ाया देश का मान

जिस नाम पर लोग हंसते थे, उसी झंडू ने कांस्य जीतकर बढ़ाया देश का मान

जिस नाम पर लोग हंसते थे, उसी झंडू ने कांस्य जीतकर बढ़ाया देश का मान
Modified Date: July 25, 2026 / 10:29 pm IST
Published Date: July 25, 2026 10:29 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

ग्लास्गो, 25 जुलाई (भाषा) राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पहले पदक विजेता के रूप में झंडू कुमार का नाम जब गूंजा तो वह सिर्फ एक कांस्य पदक की घोषणा नहीं थी, बल्कि संघर्ष, उपहास और अदम्य इच्छाशक्ति की जीत का ऐलान भी था।

बिहार के 28 वर्षीय पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने शुक्रवार को पुरुषों के हेवीवेट वर्ग में 130.9 अंक के साथ कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया।

उन्होंने 181 किलोग्राम और 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया, जबकि 196 किलोग्राम का उनका अंतिम प्रयास सफल नहीं हो सका। यह भार उनके पदक का रंग बदल सकता था।

झंडू ने भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) द्वारा आयोजित बातचीत में कहा, ‘खुशी इतनी ज्यादा है कि पिछली रात से नींद ही नहीं आई। लेटता हूं तो भी नींद नहीं आती।’

वह हालांकि अंतिम प्रयास में चूक का कोई अफसोस नहीं मानते।

उन्होंने कहा, ‘‘ शुरुआती भार मैंने सुरक्षित रखा क्योंकि अगर उसी में असफल हो जाता तो आत्मविश्वास टूट जाता। दूसरा भार पदक सुनिश्चित करने के लिए था और तीसरा स्वर्ण के लिए। तकनीकी गलती और जल्दबाजी में सांस लेने की वजह से मैं स्वर्ण से चूक गया।’’

झंडू का संघर्ष खेल के मैदान से बहुत पहले शुरू हो गया था। पांच वर्ष की उम्र में पोलियो ने उन्हें शारीरिक रूप से दिव्यांग बना दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे बैठकर चलना पड़ता था। लोग ताने मारते थे कि अब यह दिव्यांग हो गया है, आखिर करेगा क्या?’’

उनके नाम की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक है। पोलियो के इलाज में परिवार ने अपनी पूरी जमा-पूंजी खर्च कर दी। तब पिता के कुछ परिचित ताना मारते थे, ‘आपके बेटे ने सब झंडू कर दिया, सारा पैसा खत्म कर दिया।’ यही ताना धीरे-धीरे उनका नाम बन गया।

उन्होंने एक समय अपना नाम बदलकर अविनाश कुमार रखने की कोशिश भी की, लेकिन सरकारी दफ्तर में अधिकारियों ने दस्तावेज देखकर बार-बार ‘झंडू कुमार’ पुकारा और हंसने लगे।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगा कि अगर लोग मेरे नाम पर हंसकर खुश हो रहे हैं तो यही नाम सही है। अब सभी दस्तावेजों में मेरा नाम झंडू कुमार ही है। अविनाश कुमार का अब कोई अस्तित्व नहीं है।’’

आर्थिक तंगी ने उनका पीछा कभी नहीं छोड़ा। गांव में उनके माता-पिता आज भी सब्जियां बेचते हैं। अपने आहार और पोषण का खर्च उठाने के लिए झंडू ने आठ-नौ महीने तक ई-रिक्शा चलाया।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं रोज 200-400 रुपये कमाने के लिए ई-रिक्शा चलाता था ताकि उसी पैसे से ‘सप्लीमेंट’ खरीद सकूं और जिम जारी रख सकूं। पूरे दिन रिक्शा चलाने के बाद शरीर थक जाता था, जिससे अभ्यास का समय कम हो जाता था।’’

झंडू शुरुआत में शॉटपुट खिलाड़ी थे। उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। बिहार के कोच कुंदन पांडेय ने उनकी मजबूत काया देखकर इस खेल में हाथ आजमाने की सलाह दी।

उन्होंने सासाराम में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता से शुरुआत की और सीमित संसाधनों के बावजूद लगातार आगे बढ़ते गए। 2022 की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा।

उसी वर्ष सुधीर ने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।

झंडू ने कहा, ‘ जिम मालिक ने जब बताया कि सुधीर भाई ने 212 किलो वजन उठाकर स्वर्ण जीता है तो मैंने भी ठान लिया कि मुझे देश के लिए ऐसा ही करना है।’’

साइ के गांधीनगर स्थित राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र में प्रशिक्षण ले रहे झंडू ने कहा कि अब अभ्यास से जुड़ी सुविधाओं की कमी नहीं है लेकिन उनकी मंजिल अभी दूर है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह तो मेरी यात्रा की शुरुआत है। अब मुझे पैरा एशियाई खेल और पैरालंपिक की तैयारी करनी है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ इसके साथ ही मेरा सपना 232 किलोग्राम के विश्व रिकॉर्ड को तोड़ना है।

भाषा

आनन्द नमिता

नमिता


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