भोपाल। विधायकजी का रिपोर्ट लेने हम आज पहुंचे हैं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की हुजूर विधानसभा सीट। यह सीट बीजेपी का अभेद्य किला है। परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर बीजेपी का ही कब्जा है और रामेश्वर शर्मा यहां से विधायक हैं। रामेश्वर शर्मा एक बार फिर चुनावी महासमर में किस्मत आजमाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इस बार उनकी जीत की डगर इतनी आसान नहीं रहेगी। दरअसल कैचमेंट और मर्जर विवाद के अलावा पानी, सड़क और सीवेज की समस्या को लेकर क्षेत्र की मतदाता उनसे खफा हैं। जाहिर है ये सारे मुद्दे चुनाव में नेताजी के खिलाफ जा सकते हैं।
ये नाराजगी और गुस्सा बताने के लिए काफी है कि हुजूर विधानसभा की जनता के मन में क्या चल रहा है। जाहिर है जिस विकास के नाम पर बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने यहां के लोगों का दिल जीता था, वही अब उनके खिलाफ चुनावी मुद्दा बन सकता है। जी हां! भोपाल जिले में आने वाली हुजूर विधानसभा सीट सबसे बिखरे इलाकों में से एक रही है और 45 किलोमीटर के दायरे में फैले इस विधानसभा क्षेत्र को मुख्य रुप से तीन हिस्सों में बांटा गया है और तीनों ही इलाकों की अलग-अलग समस्याएं हैं। 3 लाख से ज्यादा मतदाता वाली इस विधानसभा में सबसे बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाके में आता है, जिसमें 50 से ज्यादा पंचायतें शामिल हैं। इन पंचायतों में रहने वाले किसानों की सबसे बड़ी समस्या कैचमेंट की है। किसानों की जमीन कैचमेंट में आने की वजह से वो नाराज हैं। वहीं फसलों के उचित दाम नहीं मिलने और भावांतर के नाम पर हो रहे धोखे को लेकर भी नाराजगी है।
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दूसरा महत्वपूर्ण इलाका है लालघाटी, बैरागढ़ से लेकर परवलिया तक का। इस इलाके में सिंधी समाज के लोगों की बहुलता है। सिंधी समाज से जुड़े लोग बैरागढ़ से थोक व्यापार का काम करते हैं, यहां अतिक्रमण बड़ी समस्या बनी हुई है। लंबे समय से बैरागढ़ और ईदगाह इलाके में रह रहे लोगों की जमीन का निराकरण सीएम शिवराज सिंह चौहान की घोषणाओं के बाद भी नहीं हुआ। जिससे समाज के लोग नाराज हैं।
तीसरा महत्वपूर्ण इलाका है कोलार का, जहां अधिकांश कर्मचारी औऱ रिटायर्ड कर्मचारी रहते हैं। इस इलाके में वाटर लेवर काफी नीचे होने की वजह से पानी सबसे बड़ी समस्या है। इसके अलावा कोलार क्षेत्र में आने वाले कुछ हिस्से को नगर पालिका से निगम में तब्दील किया गया है। यहां सीवेज ट्रीटमेंट की समस्या से भी लोग परेशान हैं।
वहीं विधानसभा क्षेत्र में बने झुग्गी बस्तियों में भी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। इन इलाकों में पानी की किल्लत हमेशा बनी रहती है। लोगों के मुताबिक इलाके में काफी परेशानियां हैं लेकिन कोई सुध नहीं लेता। इसे लेकर स्थानीय विधायक से लोगों में खासी नाराजगी है। वोटर तो ये तक कह रहे हैं कि विकास सिर्फ जुमला बनकर रह गया है।
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ऐसा नहीं है कि केवल हुजूर की जनता ही विधायक के कार्यकाल से नाराज हैं। चुनावी माहौल को देखते हुए विपक्ष भी स्थानीय मुद्दों को लेकर बीजेपी विधायक को घेरने में जुट गई है। हालांकि विधायक रामेश्वर शर्मा का दावा है कि उनके कार्यकाल में काफी विकास कार्य हुए।
हूजूर विधानसभा क्षेत्र का एक सिरे से दूसरे सिरे तक दौर करने के बाद हमारी टीम को समझ आ गया कि यहां सियासत के मुद्दे किस तरह दहक रहे हैं और आने वाले चुनाव में नेताओं को यहां कैसे दहकते सवालों का सामना करना पड़ेगा
हुजूर में अगर अब तक बीजेपी अजेय बनी हई है तो इसकी बहुत बड़ी वजह यहां कांग्रेस का कमजोर होना भी है। आलम ये है कि उम्मीदवारी का नाम आते ही यहां कांग्रेस में ऐसा कोई चेहरा नजर नहीं आता जो इस अहम सियासी लड़ाई में पार्टी का नेतृत्व कर सके। बावजूद इसके कांग्रेसियों का दावा है कि इस बार हुजूर सीट का निर्णय उनके पक्ष में आएगा। वहीं बीजेपी में रामेश्वर शर्मा एक बार फिर चुनाव लड़ने को तैयार हैं। हालांकि सियासी गलियारों में अगले चुनाव के लिए उनकी सीट बदले जाने की चर्चा उन्हें परेशान जरूर करती होगी।
भले ही हुजूर विधानसभा सीट पर बीजेपी का लंबे समय तक कब्जा रहा हो लेकिन भोपाल जिले में आने वाली इस विधानसभा सीट को लेकर कांग्रेस के नेताओँ का मानना है कि पार्टी अगर उन्हें मौका देती है तो इस बार वो बीजेपी के इस गढ़ को ढहा सकते हैं। आने वाले चुनाव को लेकर हुजूर में कांग्रेस दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। इसमें सबसे पहला नाम है भोपाल ग्रामीण जिला अध्यक्ष रहे अवनीश भार्गव का, जिन्हें हाल ही में कांग्रेस ने संगठन के पद से मुक्त किया है। भार्गव की माने तो अगर पार्टी उन पर भरोसा करती है तो जनता के मुद्दों को लेकर चुनावी मैदान में उतरेंगे और इस बाद ऐतिहासिक निर्णय सामने आएंगे।
महिला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मांडवी चौहान भी हुजूर सीट से चुनाव मैदान में उतरना चाहती हैं। मांडवी के मुताबिक वो लगातार जनता के बीच में सक्रिय रहती हैं और लोकल होने के कारण उनके जीतने की संभावना अधिक है। हुजूर विधानसभा में भार्गव औऱ मांडवी चौहान के अलावा मखमल मीना, मंदीत मीना, अरुण श्रीवास्तव और विनोद राजौरिया जैसे नेता भी टिकट की रेस में शामिल हैं।
वहीं दूसरी और बीजेपी से भी कई नेता हुजूर सीट से मैदान में उतरना चाहते हैं। 2008 में निर्दलीय चुनाव लड़कर सेकेंड पॉजीशन पर आने वाले भगवानदास सबनानी इस दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे हैं। इनके अलावा पूर्व विधायक जितेंद्र डागा, मनमोहन नागर और आलोक शर्मा बीजेपी से टिकट की मांग कर रहे हैं।
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हुजूर विधानसभा में कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों में टिकट के लिए संभावित उम्मिदवारों की कोई कमी नहीं है, लेकिन वर्तमान विधायक रामेश्वर शर्मा अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। विधायक की माने तो जो लोग ये कह रहे हैं कि मेरा टिकिट कटेगा उनको जनता जबाब देगी। कुल मिलाकर हुजूर विधानसभा में इस बार सियासत की जोरदार भिड़ंत हो सकती है और इसमें प्रतिद्वंदियों के साथ साथ अपनों से भी मुकाबला करना पड़ सकता है।
हुजूर में इस बार कई ऐसे मुद्दे दहक रहे हैं जो बीजेपी की उम्मीदों को झुलसा सकते हैं। वैसे सियासी इतिहास की बात की जाए तो कभी गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा रही हुजूर 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई.। परिसीमन के बाद सीट का क्षेत्र बदला लेकिन सियासी समीकरण नहीं बदले। लेकिन कांग्रेस इस बार यहां सेंध लगाने की पूर जोर कोशिश करती दिख रही है।
आने वाले चुनाव में हुजूर में एक नहीं बल्कि कई मुद्दे गूंजने वाले हैं। कई इलाकों में सड़कें इतनी बदहाल हैं कि बारिश में लोगों का आना जाना मुश्किल हो जाता है। वहीं पीने के पानी के मुद्दे पर भी विधायक को घेरने की तैयारी है। चुनावी साल है तो कांग्रेस इन मुद्दों को लेकर एक्टिव हो गई है। कांग्रेस नेता बीजेपी के इस किले को धवस्त करने के लिए एकजुट होने का दावा कर रहे हैं। ग्रामीण कांग्रेस के जिला अध्यक्ष अरुण श्रीवास्तव के मुताबिक अगर पार्टी सही प्रत्याशी को टिकट देती है वो यहां चुनाव जीत सकते हैं।
वहीं दूसरी और बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा भी सियासी माहौल को देखते हुए क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं और जनता के दरबार में पहुंचने लगे हैं। उनका दावा है कि आने वाले चुनाव में उनके सामने प्रत्याशी कोई भी हो..लेकिन जनता रिकार्ड अंतर से उन्हें ही जीताएगी।
हुजूर के सियासी इतिहास की बात की जाए तो कभी ये इलाका गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। 1967 में अस्तित्व में आई गोविंदपुरा सीट से पहली बार कांग्रेस नेता के एन प्रधान विधायक चुने गए। इसके बाद 1972 में जनता ने कांग्रेस प्रत्याशी मोहन लाल अस्थाना को अपना विधायक चुना। लेकिन समय के साथ सीट से कांग्रेस की जमीन खिसकने लगी। 1977 में जनता पार्टी के लक्ष्मी नारायण शर्मा और 1980 में बीजेपी के बाबूलाल गौर ने यहां से चुनाव जीता। 1980 के बाद इस सीट पर लगातार बाबूलाल गौर चुनाव जीतते आ रहे हैं। हालांकि 2008 में परिसीमन के बाद गोविंदपुरा सीट को बांट कर हुजूर विधानसभा सीट बनाई गई। और इस बार बीजेपी के टिकट पर जीतेंद्र दागा यहां से चुनाव जीते। इसके बाद 2013 में रामेश्वर शर्मा को बीजेपी ने टिकट दिया और उन्होंने कांग्रेस के राजेंद्र मंडलोई को 59 हजार से अधिक वोटों से शिकस्त दी।
अब जब चुनाव नजदीक है तो हूजूर में बीजेपी हो या कांग्रेस। इस बार जिसने भी यहां की जनता के मन की बात को भांपकर प्रत्याशी उतारा। वहीं यहां से सियासत की जंग जीतेगा।
वेब डेस्क, IBC24