Auraiya Rakesh Yadav:
Auraiya Rakesh Yadav: उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के लक्ष्मणपुर गांव से एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है।
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- औरैया में बुजुर्ग ने खुद की तेरहवीं
- 1900 लोगों को भेजा न्योता
- पैतृक मकान दान कर झोपड़ी में रहते
Auraiya Rakesh Yadav: औरैया: उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के लक्ष्मणपुर गांव से एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है। 65 वर्षीय राकेश यादव, जिनके दो छोटे भाई पहले बीमारियों और हत्या के कारण गुजर चुके हैं, ने अपने जीवन में अकेलेपन और भविष्य की चिंता के चलते खुद की तेरहवीं का आयोजन किया। राकेश यादव अविवाहित हैं और परिवार में बाकी कोई नहीं बचा था जो उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार और तेरहवीं जैसी परंपराओं का पालन कर सके। उन्होंने इस कदम के पीछे अपने जीवन की मार्मिक परिस्थितियों और सामाजिक अकेलेपन को कारण बताया।
उत्तर प्रदेश के औरैया से एक अनोखा मामला सामने आया है, जहां राकेश यादव जिंदा रहते हुए खुद का तेरहवीं संस्कार और भंडारा करने जा रहे हैं।
बताया जा रहा है कि राकेश अविवाहित हैं और उनके दो भाइयों की पहले ही मौत हो चुकी है। परिवार में अकेले होने के कारण उन्हें आशंका है कि उनके निधन के… pic.twitter.com/3HNq9mPbwz
— Mayank Verma 🇮🇳 (@imayankindian) March 30, 2026
Auraiya news: 1900 लोगों को न्योता, समाज में चर्चा का विषय
राकेश यादव ने अपनी तेरहवीं के लिए बाकायदा कार्ड छपवाए और गांव और आसपास के क्षेत्रों के करीब 1900 लोगों को आमंत्रित किया। उनका कहना है कि मरने के बाद यह सुनिश्चित नहीं कि कोई भंडारा करे या नहीं, इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया कि वह अपने हाथों से सबको भोज कराएंगे। इस अनोखे निमंत्रण पत्र को देखकर इलाके के लोग हैरान हैं और यह कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। उनकी यह पहल गांव में चर्चा का विषय बनी हुई है और समाज के बदलते स्वरूप में अकेलेपन की मार्मिक कहानी के रूप में देखी जा रही है।
Uttarpradesh News: झोपड़ी में साधारण जीवन, दूरगामी सोच और धार्मिक प्रवृत्ति
राकेश यादव ने अपने पैतृक मकान को एक रिश्तेदार को दान कर दिया है और स्वयं एक साधारण झोपड़ी में रहते हैं। धार्मिक प्रवृत्ति के राकेश ने हाल ही में नवरात्रि के नौ दिन व्रत रखे और जवारे भी स्थापित किए। 30 मार्च को आयोजित होने वाले इस भंडारे में बड़ी संख्या में लोगों के आने की उम्मीद है। गांव के लोग इसे राकेश की दूरगामी सोच और उनके जीवन संघर्ष से जोड़कर देख रहे हैं। 65 साल की उम्र में लिया गया यह कदम यह दिखाता है कि अपनों के चले जाने के बाद इंसान कितनी असुरक्षा और अकेलेपन का अनुभव करता है और समाज के सामने इस तरह की तैयारी भी कर सकता है।
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