पति-पत्नी के झगड़े में पत्नी को ‘बांझ’ कहना क्रूरता नहीं : उच्‍च न्‍यायालय

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पति-पत्नी के झगड़े में पत्नी को ‘बांझ’ कहना क्रूरता नहीं : उच्‍च न्‍यायालय

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  • Publish Date - August 14, 2026 / 06:18 PM IST,
    Updated On - August 14, 2026 / 06:18 PM IST

लखनऊ, 14 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि संतान न होने को लेकर कहासुनी के दौरान पति द्वारा पत्नी को ‘बांझ’ (निसंतान) कहना, अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत क्रूरता का अपराध नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने हिरेंद्र कुशवाहा की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (पति या रिश्तेदारों द्वारा विवाहिता के साथ क्रूरता), धारा 323 (स्‍वेच्‍छा से चोट पहुंचाना), धारा 504 (जानबूझकर अपमान करना) व धारा 506 (आपराधिक धमकी) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3/4 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

मामला लखनऊ के गाजीपुर थाने से संबंधित था।

पीठ ने कहा कि आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानने पर भी यह मामला मुख्य रूप से संतान न होने से उत्पन्न वैवाहिक विवाद और पति-पत्नी के बीच एक-दूसरे के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों का प्रतीत होता है।

अदालत ने कहा कि संतान न होने को लेकर महज ताने, चिकित्सकीय जांच कराने से इनकार या घरेलू विवाद के दौरान हुई कहासुनी धारा 498-ए के तहत तब तक अपराध नहीं है जब तक निर्धारित क्रूरता के आवश्यक तत्व पूरे न हों।

जोड़े की शादी दिसंबर 2015 में हुई थी। उनके कोई संतान नहीं हुई। पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसे संतान पैदा न कर पाने के लिए ताने दिए जाते थे। 23 नवंबर 2020 को विवाद के दौरान मारपीट कर उसे कमरे में बंद करने का भी आरोप लगाया गया था। पत्नी ने ससुर और देवर पर दुष्कर्म के आरोप भी लगाए थे।

मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत पत्नी की शिकायत पर केवल पति को आरोपी बनाते हुए समन जारी किया था। पति ने इसे उच्‍च न्‍यायालय में चुनौती दी थी।

मामले में निर्णय सुनाते हुए अदालत ने ‘बांझ’ कहने के आरोप पर कहा कि टिप्पणी निश्चित रूप से असंवेदनशील और निंदनीय है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियों में यह भारतीय दंड संहिता की धारा 504 के तहत अपराध के लिए पर्याप्त नहीं है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल अपशब्द या अपमानजनक शब्दों का आदान-प्रदान धारा 504 का अपराध नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो कि अपमान जानबूझकर इस उद्देश्य से किया गया था कि उससे शांति भंग या कोई अन्य अपराध होने की संभावना थी।

पीठ ने यह भी पाया कि मूल शिकायत में दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं था और बाद में बयान में ऐसा आरोप जोड़ा गया। अदालत ने कहा कि बाद के बयान से मूल शिकायत में छोड़ी गई कमियों को पूरा नहीं किया जा सकता।

आरोपों को मुख्यतः सामान्य और पर्याप्त आधार से रहित मानते हुए उच्‍च न्‍यायालय ने कहा कि मुकदमा जारी रखना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही पति के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

भाषा सं आनन्द जोहेब शफीक

शफीक