अदालत ने श्रावस्ती मुठभेड़ की सीबीआई जांच का आदेश दिया, पुलिस की कहानी पर उठाए सवाल

अदालत ने श्रावस्ती मुठभेड़ की सीबीआई जांच का आदेश दिया, पुलिस की कहानी पर उठाए सवाल

अदालत ने श्रावस्ती मुठभेड़ की सीबीआई जांच का आदेश दिया, पुलिस की कहानी पर उठाए सवाल
Modified Date: August 19, 2026 / 09:46 pm IST
Published Date: August 19, 2026 9:46 pm IST

लखनऊ, 19 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने श्रावस्ती में हुई एक कथित पुलिस मुठभेड़ की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने का बुधवार को आदेश दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में कई स्पष्ट विसंगतियां हैं और प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि थाना प्रभारी ने घटना का गलत विवरण पेश किया।

अदालत ने निर्देश दिया कि जांच रिपोर्ट तीन महीने के भीतर पेश की जाए।

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

अदालत ने सीबीआई को इकौना थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109 और शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 के तहत दर्ज प्राथमिकी की सत्यता की जांच करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने सीबीआई को थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की निशाना लगाने की क्षमता की भी जांच करने को कहा है।

इसने कहा कि इस जांच में यह भी देखा जाएगा कि क्या वह रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार में गोली भरने की आवाज सुनकर अपनी नौ एमएम की सरकारी पिस्तौल से सटीक निशाना लगा सकते हैं।

अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज घावों के आकार और थाना प्रभारी के इस स्पष्टीकरण पर भी सवाल उठाया कि ये घाव नौ एमएम की गोली लगने से हुए थे।

मामला उस कथित मुठभेड़ से जुड़ा है, जिसमें अलाउद्दीन के दोनों पैरों में गोली लगी थी। पुलिस का दावा था कि उसने 23 सदस्यीय पुलिस दल पर गोली चलाई थी।

थाना प्रभारी के अनुसार, हथियार में गोली भरने की आवाज सुनने के बाद उन्होंने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं।

अलाउद्दीन के अधिवक्ता नदीम मुर्तजा ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्राथमिकी के अनुसार 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे और बाद में तीन दलों में बंट गए, जबकि किसी अन्य वाहन का उल्लेख नहीं है। इसके बाद 10 सदस्यों वाला एक और दल मौके पर पहुंचा और पुलिसकर्मियों की कुल संख्या 23 हो गई।

मुर्तजा ने सवाल उठाया कि 23 पुलिसकर्मी एक ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति को कैसे नहीं रोक पाए।

उन्होंने यह भी कहा कि यह बात समझ से परे है कि पुलिस दल कथित रूप से एक देसी तमंचा और केवल दो कारतूस रखने वाले व्यक्ति से निपटने के लिए छिप गया और अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया।

अदालत ने गोली लगने के बाद अलाउद्दीन से कथित रूप से दर्ज कराए गए इकबालिया बयान पर भी सवाल उठाए।

अदालत ने कहा कि सात वर्षीय बच्ची के अपहरण से संबंधित मूल प्राथमिकी घटना के 61 मिनट के भीतर दर्ज हो गई थी, लेकिन उसमें दुष्कर्म, रक्तस्राव या बच्ची के घायल होने का कोई उल्लेख नहीं था। ये बातें बाद में कथित इकबालिया बयान में सामने आईं।

अदालत ने प्रथमदृष्टया माना कि पुलिस ने संभवतः झूठा इकबालिया बयान दर्ज किया।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मुठभेड़ में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को कथित अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया था। इसमें उस अपराध के संबंध में आरोपी से कथित इकबालिया बयान हासिल करना भी शामिल था, जिसमें अलाउद्दीन को पहले ही बरी किया जा चुका था।

उच्चतम न्यायालय द्वारा पुलिस मुठभेड़ों की जांच के लिए तय दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रथमदृष्टया इस मामले में गंभीर चोट वाले मुठभेड़ मामलों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

वहीं, याचिकाकर्ता को राहत देते हुए अदालत ने अलाउद्दीन की रिहाई की याचिका खारिज करने के श्रावस्ती की सत्र अदालत के दो जुलाई के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी और मामले को 23 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

भाषा सं. जफर खारी

खारी


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