आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान ‘तारीख पर तारीख’ नहीं बन सकती : उच्‍च न्‍यायालय

आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान ‘तारीख पर तारीख’ नहीं बन सकती : उच्‍च न्‍यायालय

आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान ‘तारीख पर तारीख’ नहीं बन सकती : उच्‍च न्‍यायालय
Modified Date: July 17, 2026 / 11:46 pm IST
Published Date: July 17, 2026 11:46 pm IST

लखनऊ, 17 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था की पहचान ”तारीख पर तारीख” नहीं बन सकती।

पीठ लगभग 25 साल पुराने अपहरण के एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कथित पीड़िता और आरोपी ने बाद में शादी कर ली थी और अब वे तीन बच्चों के माता-पिता हैं।

बहराइच की विचारण अदालत के कामकाज पर कड़ी टिप्पणी करते हुए, पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक मामले को दो दशक से ज़्यादा समय तक लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई की संवैधानिक गारंटी के खिलाफ है।

अदालत ने दोनों आरोपियों को अग्रिम ज़मानत भी दे दी। ये टिप्पणियां न्‍यायमूर्ति राजीव भारती ने अजय कुमार उर्फ चिंगी और राम चंद्र की अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी को मंज़ूरी देते हुए कीं।

यह मामला 2001 में बहराइच के पयागपुर पुलिस थाना में दर्ज अपहरण के मामले से जुड़ा था।

सुनवाई के दौरान, अदालत को बताया गया कि कथित पीड़िता अपनी मर्ज़ी से अजय कुमार के साथ गई थी। बाद में दोनों ने शादी कर ली और अब पति-पत्नी के तौर पर खुशी-खुशी रह रहे हैं। उनके तीन बच्चे हैं।

राज्य सरकार इन तथ्यों का प्रभावी ढंग से खंडन नहीं कर सकी। अपने आदेश में उच्‍च न्‍यायालय ने कहा कि कई सालों से सुनवाई में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है, जिससे आपराधिक कार्यवाही केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है।

पीठ ने ज़ोर दिया कि न्याय को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। पीठ ने आदेश दिया कि दोनों आरोपी दो हफ़्ते के भीतर अदालत के सामने आत्‍मसमर्पण करें और उन्हें कुछ शर्तों के साथ अग्रिम ज़मानत पर रिहा किया जाए। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ज़मानत आदेश में की गई टिप्पणियां मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला करते समय अधीनस्थ अदालत को प्रभावित नहीं करेंगी।

भाषा सं आनन्‍द संतोष

संतोष


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