गारंटर यह नहीं कह सकता कि पहले कर्जदार से वसूली करो: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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गारंटर यह नहीं कह सकता कि पहले कर्जदार से वसूली करो: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - August 11, 2026 / 04:48 PM IST,
    Updated On - August 11, 2026 / 04:48 PM IST

लखनऊ, 11 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बैंक के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह पहले मुख्य कर्जदार से ऋण की पूरी रकम वसूल करे और उसके बाद गारंटर के खिलाफ कार्रवाई करे।

अदालत ने कहा कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128 के तहत गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के समान होती है और बैंक कर्जदार व गारंटर दोनों के खिलाफ एक साथ वसूली की कार्रवाई कर सकता है।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने विनीत पांडेय व अनूप कुमार मिश्रा की दो याचिकाएं खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपने सहकर्मी विक्रांत दुबे द्वारा लिए गए ऋण के लिए गारंटी दी थी।

दुबे ने वर्ष 2022-23 में उप्र पोस्टल प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड से 50 हजार रुपये का फेस्टिवल लोन, तीन लाख रुपये का शॉर्ट टर्म लोन और 18 लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण लिया था।

बैंक ने ऋण की अदायगी में चूक होने पर वसूली की कार्रवाई शुरू की और डाक विभाग को दोनों गारंटरों के वेतन से प्रतिमाह 10 हजार रुपये काटकर बैंक में जमा करने को कहा।

गारंटरों ने दलील दी कि बैंक को पहले मुख्य कर्जदार से बकाया वसूलना चाहिए और केवल शेष राशि के लिए गारंटरों से संपर्क किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने कर्जदार और गारंटर दोनों से एक साथ वसूली को अवैध बताया।

उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि धारा 128 के अनुसार, जब तक गारंटी अनुबंध में इसके विपरीत कोई शर्त न हो, गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के समान और सह-विस्तृत होती है।

अदालत ने कहा कि ऋणदाता के लिए मुख्य कर्जदार के खिलाफ पहले कार्रवाई करना अनिवार्य नहीं है।

खंडपीठ ने कहा कि संबंधित गारंटी अनुबंध में ऐसी कोई शर्त नहीं थी, जिससे गारंटर की देनदारी को बाद के चरण तक टाला गया हो इसलिए बैंक को वेतन से प्रतिमाह 10 हजार रुपये की कटौती कर वसूली करने का अधिकार था।

पीठ ने यह भी कहा कि गारंटर द्वारा ऋण चुकाने के बाद वह मुख्य कर्जदार से रकम की वसूली या योगदान का दावा कर सकता है लेकिन इससे बैंक की वसूली कार्रवाई पर रोक नहीं लगती।

उच्च न्यायालय ने प्रतिमाह 10 हजार रुपये की वेतन कटौती को वैध मानते हुए दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।

भाषा सं आनन्द जितेंद्र

जितेंद्र