Kanwar Yatra 2026 : कांवड़ यात्रा में दिखा नया ट्रेंड! प्लास्टिक छोड़ प्रकृति को अपना रहे शिवभक्त, हर कांवड़ दे रही बड़ा संदेश

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हरिद्वार से शिवालयों की ओर बढ़ रहे कांवड़िए इस बार आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं। प्लास्टिक छोड़कर बांस, जूट, फूल-पौधों और प्राकृतिक सामग्री से बनी कांवड़ लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।

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  • Publish Date - August 6, 2026 / 09:42 PM IST,
    Updated On - August 7, 2026 / 12:06 AM IST

Kanwar Yatra 2026

HIGHLIGHTS
  • कांवड़ निर्माण में प्लास्टिक की जगह बांस, जूट और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग बढ़ा।
  • बागपत के पुरा महादेव मंदिर में फूलों और पत्तियों का वैज्ञानिक तरीके से पुनः उपयोग किया जाएगा।
  • पर्यावरणविदों ने कांवड़ यात्रा को जल संरक्षण और पौधारोपण से जोड़ने की अपील की।

मेरठ : Kanwar Yatra 2026 हरिद्वार से गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर बढ़ रहे शिवभक्तों की कांवड़ इस बार केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी सशक्त संदेश दे रही है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर कहीं भगवान शिव, मां पार्वती, महाकाल और हनुमान की भव्य झांकियां श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित कर रही हैं तो कहीं कांवड़ को फूल-पौधों, बांस और जूट की रस्सियों से सजाकर हरियाली और प्लास्टिक मुक्त जीवन का संदेश दिया जा रहा है।विशाल कांवड़ लेकर चल रहे अनेक शिवभक्त प्लास्टिक का उपयोग छोड़कर स्टील के पात्र, बांस, कपड़े और प्राकृतिक सामग्री से अपनी कांवड़ तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश प्रसारित हो रहा है, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं के बीच स्वच्छ और हरित कांवड़ यात्रा का सकारात्मक अभियान भी मजबूत हो रहा है।

हरकी पैड़ी से शिवालयों तक हरित पहल

हरिद्वार से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख शिवालयों तक पर्यावरण संरक्षण के लिए कई पहलें दिखाई दे रही हैं।Kanwar Yatra Latest Newsकांवड़ निर्माण में प्लास्टिक के प्रयोग से बचने की अपील का असर बड़ी कांवड़ों पर स्पष्ट नजर आ रहा है। बागपत के प्रसिद्ध पुरा महादेव मंदिर में इस वर्ष चढ़ने वाले फूल और पत्तियों का पृथक संग्रह किया जाएगा। फूलों का उपयोग अगरबत्ती निर्माण में किया जाएगा, जबकि फल और पत्तियों को गौशालाओं में उपयोग के लिए भेजा जाएगा। इससे धार्मिक अवशेषों के वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

जल, जंगल और जमीन के सम्मान का पर्व

पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का कहना है कि कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में जल, जंगल और जमीन के प्रति सम्मान का जीवंत प्रतीक है। सावन का महीना प्रकृति के पुनर्जीवन का काल होता है। यदि कांवड़ यात्रा को पौधारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवन और स्वच्छ जलस्रोतों के अभियान से जोड़ा जाए तो यह दुनिया का सबसे बड़ा जनभागीदारी आधारित पर्यावरण जागरूकता अभियान बन सकता है।
उनका कहना है कि भारतीय संस्कृति सदियों से प्रकृति को पूजनीय मानती आई है। ऐसे में यदि प्रत्येक कांवड़िया एक पौधा लगाने, जल बचाने और प्लास्टिक का उपयोग न करने का संकल्प ले, तो इसका सकारात्मक प्रभाव समाज और पर्यावरण दोनों पर दिखाई देगा। आस्था और प्रकृति का यह संगम आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और हरित भविष्य की मजबूत नींव साबित हो सकता है।

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