ग्राम पंचायत के गठन के लिए अंतिम जनगणना के आधार पर न्यूनतम आबादी जरूरी : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

ग्राम पंचायत के गठन के लिए अंतिम जनगणना के आधार पर न्यूनतम आबादी जरूरी : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

ग्राम पंचायत के गठन के लिए अंतिम जनगणना के आधार पर न्यूनतम आबादी जरूरी : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: August 1, 2026 / 12:57 am IST
Published Date: August 1, 2026 12:57 am IST

लखनऊ, 31 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम के तहत ग्राम पंचायत के गठन और उसके अस्तित्व के लिए कानून में निर्धारित न्यूनतम जनसंख्या की शर्त पूरी होना अनिवार्य है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्राम पंचायत की आबादी का निर्धारण वर्तमान जनसंख्या के आधार पर नहीं, बल्कि अंतिम प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों के अनुसार किया जाएगा।

इस टिप्पणी के साथ न्यायालय ने गोंडा जिले की करुआ ग्राम पंचायत को समाप्त कर उसे कुम्हरौरा ग्राम पंचायत में विलय करने के राज्य सरकार के फैसले को वैध ठहरा दिया।

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने गुड़िया गोस्वामी समेत 293 अन्य लोगों की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

याचिका में 19 अप्रैल, 2023 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत करुआ ग्राम पंचायत को समाप्त कर उसके शेष क्षेत्र का कुम्हरौरा ग्राम पंचायत में विलय कर दिया गया था।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि करुआ ग्राम पंचायत के कुछ हिस्से को नगर पालिका परिषद कर्नलगंज में शामिल किए जाने के बाद भी इसकी आबादी 1,719 और मतदाताओं की संख्या 1,104 है। ऐसे में ग्राम पंचायत को समाप्त करने का निर्णय अवैध है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2011 की अंतिम प्रकाशित जनगणना के अनुसार करुआ ग्राम पंचायत की शेष आबादी केवल 785 थी, जबकि पंचायत के गठन और अस्तित्व के लिए न्यूनतम 1,000 की आबादी आवश्यक है।

फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि अधिनियम में प्रयुक्त ‘जनसंख्या’ शब्द का अर्थ अंतिम प्रकाशित जनगणना में दर्ज आबादी से है। वर्तमान आबादी या मतदाताओं की संख्या के आधार पर ग्राम पंचायत का दर्जा बनाए रखने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि यदि वर्तमान जनसंख्या को आधार बनाया जाएगा तो पंचायतों के गठन और सीमाओं में लगातार बदलाव की स्थिति बनेगी, जिससे प्रशासनिक अस्थिरता पैदा होगी। इसी कारण कानून ने अंतिम प्रकाशित जनगणना को निश्चित मानक बनाया है।

पीठ ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायत क्षेत्र का गठन, पुनर्गठन या सीमाओं का निर्धारण राज्य सरकार का विधायी कार्य है। ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप तभी संभव है, जब संबंधित कार्रवाई कानून के किसी प्रावधान का उल्लंघन करती हो।

अदालत ने तथ्यों के आधार पर माना कि वर्ष 2011 की अंतिम प्रकाशित जनगणना के अनुसार करुआ ग्राम पंचायत की आबादी 785 होने के कारण उसका स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की वैधानिक शर्त पूरी नहीं होती। इसलिए 19 अप्रैल, 2023 की अधिसूचना में कोई अवैधता नहीं है और याचिका खारिज किए जाने योग्य है।

भाषा

सं, आनन्द रवि कांत


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