विकास का पैमाना केवल जीडीपी नहीं, नागरिकों की खुशहाली भी होनी चाहिए : आलोक रंजन
विकास का पैमाना केवल जीडीपी नहीं, नागरिकों की खुशहाली भी होनी चाहिए : आलोक रंजन
(किशोर द्विवेदी)
लखनऊ, 19 जुलाई (भाषा) उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन का मानना है कि सरकारों को विकास का पैमाना केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय नागरिकों की खुशहाली और समग्र भलाई को सार्वजनिक नीति का केंद्र बनाया जाना चाहिए।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी आलोक रंजन ने अपनी नयी पुस्तक ‘बियॉन्ड जीडीपी : इन परसूट ऑफ मेजरिंग हैप्पीनेस’ (जीडीपी से आगे : खुशहाली मापने की कोशिश) में इस धारणा पर सवाल उठाया है कि अधिक आर्थिक समृद्धि से स्वतः अधिक खुशी मिलती है। रंजन अपनी पुस्तक में एक मूलभूत प्रश्न उठाते हैं, ‘‘यदि हम हजार गुना अधिक अमीर हो जाएं, तो क्या हम हजार गुना अधिक खुश भी होंगे?’’
ओम बुक्स इंटरनेशनल की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक में रंजन ने वैश्विक शोध, भारत के अनुभव और अंतरराष्ट्रीय खुशहाली अध्ययनों के आधार पर तर्क दिया है कि सरकारों का उद्देश्य केवल जीडीपी या अन्य आर्थिक संकेतकों में वृद्धि करना नहीं, बल्कि नागरिकों की खुशहाली बढ़ाना होना चाहिए।
पुस्तक में कहा गया है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद ‘विश्व खुशहाली रिपोर्ट’ में भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है। वर्ष 2024 की रिपोर्ट में भारत 143 देशों में 126वें स्थान पर था, जबकि 2025 की रिपोर्ट में वह 147 देशों में 118वें स्थान पर पहुंचा। इसके बावजूद भारत दुनिया के 100 सबसे खुशहाल देशों की सूची में शामिल नहीं हो सका।
रंजन का कहना है कि ये रैंकिंग इस बात का संकेत है कि नीति-निर्माण में केवल आर्थिक उत्पादन के बजाय लोगों की समग्र भलाई पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
उन्होंने लिखा, ‘‘राज्य का उद्देश्य अपने नागरिकों की भलाई बढ़ाना है। सार्वजनिक नीति का लक्ष्य आर्थिक विकास के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता में सुधार भी होना चाहिए।’’
दशकों तक वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर कार्य कर चुके रंजन के अनुसार, जीडीपी मुख्य रूप से आर्थिक गतिविधियों को मापता है और लोगों की समग्र भलाई का समुचित आकलन नहीं कर पाता। इसलिए नीति-निर्माण के लिए ऐसे व्यापक मानकों की आवश्यकता है, जिनमें जीवन की गुणवत्ता के विभिन्न आयाम शामिल हों।
उन्होंने हालांकि, सरकारों द्वारा स्वयं खुशहाली तय करने या उसका आकलन करने के प्रति भी सावधानी बरतने की सलाह दी है। पुस्तक में ब्रूनो एस. फ्रे की पुस्तक ‘हैप्पीनेस एंड इकोनॉमिक्स’ का हवाला देते हुए कहा गया है कि सरकार को खुशहाली अधिकतम करने का प्रत्यक्ष दायित्व नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि आंकड़ों के संग्रह और विश्लेषण पर उसका नियंत्रण होने से किसी भी खुशहाली सूचकांक में पक्षपात या हेरफेर की आशंका बनी रहती है।
रंजन का कहना है कि राजनीतिक कारणों से सत्तारूढ़ सरकारें ऐसे परिणाम सामने लाने से बच सकती हैं, जिनसे लोगों में असंतोष का संकेत मिले। उनका यह भी तर्क है कि सरकारी खुशहाली सर्वेक्षणों में उत्तरदाता यह सोचकर अपने जवाब बदल सकते हैं कि उनका इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।
राजनीति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है कि राजनीतिक दलों का मुख्य उद्देश्य चुनाव जीतना और सत्ता में बने रहना होता है, जिसके लिए वे अक्सर लोकलुभावन वादे करते हैं। उनके अनुसार, कई बार ऐसे कदम जनता के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप नहीं होते।
रंजन ने कहा कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में चुनावों से पहले राजनीतिक दल विभिन्न वर्गों को आकर्षित करने के लिए सब्सिडी, मुफ्त सुविधाओं और किसान कर्ज माफी जैसे वादे करते हैं, जिनका उद्देश्य अक्सर राजनीतिक समर्थन हासिल करना होता है।
पुस्तक में उन्होंने कहा है कि ‘‘जीडीपी के ऊंचे आंकड़े मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत हो सकते हैं, लेकिन किसी भी देश की वास्तविक संपदा उसके लोगों की खुशहाली में निहित होती है।’’
यह पुस्तक मानव विकास सूचकांक, सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी), विश्व खुशहाली रिपोर्ट और भूटान के सकल राष्ट्रीय खुशहाली (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) मॉडल जैसे वैश्विक ढांचों का भारतीय संदर्भ में विश्लेषण करती है।
रंजन आर्थिक विकास के महत्व को नकारते नहीं हैं, बल्कि ऐसी नीतियों की वकालत करते हैं जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ लोगों की समग्र भलाई और जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार सुनिश्चित करें।
उनका कहना है कि सरकारों को अपनी सफलता का आकलन केवल आय और उत्पादन से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से करना चाहिए।
भाषा
किशोर, आनन्द रवि कांत

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