लखनऊ, सात अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने एक नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए जाने पर 11 साल जेल में बिताने वाले व्यक्ति को पुलिस जांच में गंभीर खामियों और विश्वसनीय सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए मंगलवार को बरी कर दिया।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति बृजराज सिंह की पीठ ने आरोपी निर्मल कुमार की अपील को स्वीकार करते हुए 2018 के अधीनस्थ न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
यह मामला 2010 का है, जब अयोध्या जिले में मानसिक रूप से विकलांग 14 वर्षीय एक लड़की के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म हुआ था। घटना के तीन दिन बाद पीड़िता की मौत हो गई थी, जिसके बाद उसके पिता ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और हत्या का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
अधीनस्थ अदालत ने आरोपी को दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन मृत्यु के कारण स्पष्ट न होने के कारण उसे हत्या के आरोप से बरी कर दिया था।
सबूतों की पुनः जांच करने पर उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के मामले में महत्वपूर्ण कमियां पाईं। पीठ ने पाया कि फोरेंसिक रिपोर्ट में मानव वीर्य की उपस्थिति का संकेत मिला था, लेकिन डीएनए परीक्षण या अन्य वैज्ञानिक सत्यापन न होने के कारण नमूनों को आरोपी से जोड़ने वाला कोई निर्णायक सबूत नहीं था।
इसे जांच में एक गंभीर खामी बताते हुए, न्यायालय ने आदेश में कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि संदेह से परे सबूतों पर आधारित होनी चाहिए, न कि संदेह या अनुमानों पर।
अभियोजन पक्ष द्वारा निश्चित रूप से अपराध साबित करने में विफल रहने पर, पीठ ने दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
भाषा सं आनन्द राजकुमार
राजकुमार