Uttar Pradesh News: सड़क से सदन तक पहुंचा ‘हल्ला बोल’… पढ़ें नागेंद्र रंजन का ख़ास लेख  

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Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश विधानसभा केवल विधायी कार्यों का केंद्र नहीं है, बल्कि जनता के समस्याओं का समाधान तलाशने और उसके सशक्तीकरण की राह प्रशस्त करने का मंच है।

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  • Publish Date - August 5, 2026 / 05:49 PM IST,
    Updated On - August 5, 2026 / 05:52 PM IST

Uttar Pradesh News/Image Credit: AI

नागेंद्र रंजन, लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा केवल विधायी कार्यों का केंद्र नहीं है, बल्कि यह राज्य की 25 करोड़ जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने, उसकी समस्याओं का समाधान तलाशने और उसके सशक्तीकरण की राह प्रशस्त करने का मंच है। इस मंच पर किया जाने वाला कोई भी अलोकतांत्रिक कार्य जनता के हितों पर सीधा कुठाराघात ही कहा जाएगा। मंगलवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान जिस प्रकार का दृश्य देखने को मिला, उसने लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। विपक्षी दल, विशेषकर समाजवादी पार्टी (सपा) के सदस्यों द्वारा सदन के भीतर और बाहर जिस प्रकार का अभद्र व अराजक आचरण प्रस्तुत किया गया, वह लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत है।

लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने का अधिकार विपक्ष को संविधान द्वारा प्रदान किया गया है, किंतु जब विरोध का यह रूप रचनात्मक बहस के स्थान पर वेल में आकर नारेबाजी, तख्तियां (प्लेकार्ड) लहराने और अध्यक्ष पीठ की अवमानना तक पहुंच जाए, तो इसे केवल राजनीतिक हथकंडा कहा जा सकता है। किसी भी विधानसभा में कार्यवाही का संचालन नियमों और मर्यादाओं के आधार पर होता है। (Uttar Pradesh News) विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) की पीठ सदन की निष्पक्षता और सर्वोच्च गरिमा की प्रतीक मानी जाती है। मंगलवार को सदन की कार्यवाही प्रारंभ होते ही समाजवादी पार्टी के सदस्य न सिर्फ वेल में उतर आए, बल्कि आसन के सामने प्लेकार्ड्स लहराते हुए उग्र नारेबाजी करने लगे। अध्यक्ष पीठ द्वारा बार-बार सदस्यों को अपनी सीटों पर जाने और शांत होकर अपनी बात रखने का आग्रह किए जाने के बावजूद सपा विधायकों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया।

Uttar Pradesh News: यहां एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सपा विधायकों ने अयोध्या चढ़ावा प्रकरण पर सदन में चर्चा की अनुचित मांग उठाई। मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने की वजह से यह मांग सरासर गलत थी, फिर भी सदन की कार्यवाही चलने के उद्देश्य से अध्यक्ष पीठ द्वारा इसे भी स्वीकार कर लिया गया, लेकिन सपा सदस्यों का मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही था। विपक्ष का यह रवैया दिखाता है कि वे विधायी प्रक्रियाओं और अध्यक्षीय व्यवस्था को स्वीकार करने के मूड में नहीं थे। किसी विधायक का असंसदीय व्यवहार के कारण पूरे सत्र के लिए निलंबित किया जाना इस बात का प्रमाण है कि सदन के नियमों की धज्जियां किस सीमा तक उड़ाई गईं।

संसदीय मर्यादा कहती है कि सदन में बहस, और उस दौरान होने वाला तर्क-वितर्क एक समाधान की दिशा में ले जाता है। लेकिन, जब सदन की कार्यवाही ही बाधित कर दी जाए तो बहस की गुंजाइश ही कहां बचती है। उत्तर प्रदेश पूर्व में भी जनहित के मुद्दों को अनदेखा कर ‘हल्ला बोल’ की राजनीति का हश्र देख चुका है। (Uttar Pradesh News) इसी राजनीति ने यूपी के माथे पर ‘बीमारू राज्य’ का लेबल चस्पा कर दिया था। जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले सदन का समय अत्यंत कीमती होता है। राज्य के बजट, विकास योजनाओं, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर गंभीर चर्चा के लिए विधानसभा का सत्र आहूत किया जाता है। जब करोड़ों रुपये की लागत से चलने वाला सदन अराजकता व हंगामे की भेंट चढ़ जाता है, तो अंततः इसका नुकसान आम नागरिक को ही उठाना पड़ता है।

Uttar Pradesh News: बेहतर होता कि समाजवादी पार्टी आदर्श विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करते हुए नियमबद्ध चर्चा के लिए तैयार होती। सपा विधायकों को सरकार से प्रश्न करने का मौका मिलता और सरकार को उत्तर देने का। और, जनता को अवसर मिलता दोनों पक्षों की बात सुनने, समझने और सही-गलत का निर्णय लेने का। लेकिन, जब सत्ता पक्ष द्वारा यह प्रस्ताव दिया गया कि विपक्ष जिन भी विषयों पर बात करना चाहता है, उन पर नियमबद्ध तरीके से चर्चा कराने के लिए सरकार तैयार है, तब भी विपक्ष ने सार्थक बहस में भाग लेने के स्थान पर वाकआउट और नारेबाजी को प्राथमिकता दी। राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए सनसनीखेज नारे लगाना और बिना साक्ष्य के आरोप गढ़कर सदन का कामकाज रोकना जनहित के साथ सीधा खिलवाड़ है।

संसदीय लोकतंत्र की ताकत उसके सिद्धांतों और संस्थाओं के प्रति निष्ठा में निहित होती है। जब कोई राजनीतिक दल लगातार विधायिका, चुनाव आयोग, कार्यपालिका और व्यवस्था पर अविश्वास व्यक्त करते हुए सड़क के ‘हल्ला बोल’ को सदन के भीतर लाने का प्रयास करता है, तो इससे लोकतांत्रिक ढांचे को गहरा आघात पहुंचता है। (Uttar Pradesh News)  धार्मिक आस्थाओं और संवेदनशील प्रकरणों का उपयोग राजनीति की रोटियां सेकने के लिए करना न केवल समाज में विभाजन पैदा करता है, बल्कि सदन के माहौल को भी विषाक्त करता है। विपक्ष का काम निश्चित रूप से सरकार को कठघरे में खड़ा करना है, लेकिन इसका जरिया ठोस तथ्य और कानून होना चाहिए, न कि असंसदीय व्यवधान।

Uttar Pradesh News: विधानसभा कोई युद्धक्षेत्र या केवल विरोध प्रदर्शन का स्थल नहीं है। यह नीति-निर्माण का पवित्र मंदिर है। जनता ने समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका सौंपी है। ऐसे में यह उसकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वह विरोध दर्ज कराने के लिए लोकतांत्रिक और मर्यादापूर्ण मार्ग चुने। सदन को पंगु बनाना और विधानसभा के भीतर अभद्र आचरण का प्रदर्शन करना किसी भी स्थिति में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। विपक्ष को यह समझना होगा कि शोर-शराबे से सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन जनता का विश्वास केवल तर्कसंगत और गंभीर जन-प्रतिनिधित्व से ही हासिल किया जा सकता है। संसदीय गरिमा को पुनर्जीवित करने के लिए विपक्ष को अपने आचरण पर गंभीर आत्ममंथन करने की अत्यंत आवश्यकता है।

(Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।)

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