क्या मांस और डेरी उत्पादों के विकल्पों से लोगों का मोहभंग हो रहा है?

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क्या मांस और डेरी उत्पादों के विकल्पों से लोगों का मोहभंग हो रहा है?

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  • Publish Date - June 17, 2026 / 03:42 PM IST,
    Updated On - June 17, 2026 / 03:42 PM IST

(मिलेना बोजोविक, प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय सिडनी)

सिडनी, 17 जून (द कन्वरसेशन) हमारे बड़े किराना स्टोर की अलमारियां मांस और डेरी उत्पादों से भरी रहती हैं। इनमें पनीर और दूध से लेकर कीमा बनाया हुआ गोमांस तक शामिल है।

औसतन आस्ट्रेलियाई हर साल 22 किलोग्राम से अधिक मांस और 90 किलोग्राम डेरी उत्पादों का सेवन करता है, लेकिन पिछले पांच वर्षों के दौरान ऑस्ट्रेलियाई नागरिक तेजी से वैकल्पिक प्रोटीन की ओर रुख कर रहे हैं। दस में से छह आस्ट्रेलियाई ने कहा कि उन्होंने पौधा-आधारित उत्पादों को या तो आजमाया है या वे उन्हें आजमाने में रुचि रखते हैं।

इसके पीछे ऐसे प्रमाण हैं, जिनसे पता चलता है कि पौधों पर आधारित आहार स्वास्थ्य और पर्यावरण, दोनों के लिए लाभकारी हो सकता है। पौधों पर आधारित आहार का अर्थ ऐसे भोजन से है जिसमें पशु उत्पाद शामिल नहीं होते हैं और जो बहुत कम प्रसंस्कृत होता है।

जैसे-जैसे पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ी, वैसे-वैसे ऐसे रेस्तरां और वैकल्पिक प्रोटीन उत्पादों का बाजार भी बढ़ता गया। वर्ष 2022 में ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय विज्ञान एजेंसी ‘सीएसआईआरओ’ ने अपना ‘प्रोटीन रोडमैप’ जारी किया था, जिसमें अनुमान लगाया गया था कि 2030 तक वैकल्पिक प्रोटीन का बाजार 13 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का हो जाएगा।

हालांकि, हाल के रुझान बताते हैं कि अब लोग मांस और डेरी विकल्पों में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।

रेस्तरां बंद हो रहे हैं और उत्पाद बाजार से गायब हो रहे

पिछले एक दशक के दौरान ऐसा लग रहा था कि ऑस्ट्रेलिया खाद्य क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की दहलीज पर है, क्योंकि देशभर में पौधों पर आधारित कारोबार तेजी से शुरू हो रहे थे।

हालांकि, अब यह रुझान लगभग थम गया है। अकेले सिडनी में पिछले तीन वर्षों के दौरान पौधों पर आधारित भोजन परोसने वाले 10 से अधिक उच्च श्रेणी के रेस्तरां बंद हो चुके हैं। इनमें सिडनी का पहला शाकाहारी पब ‘द ग्रीन लायन’ भी शामिल है, जो अब केवल भोजन पैक करके ग्राहक को देने और व्यावसायिक कैटरिंग सेवा का काम कर रहा है।

प्रमुख होटल शृंखला ‘ओवोलो होटल्स’ समूह ने भी 2024 में सिडनी स्थित अपने ‘अलिबी’ रेस्तरां को बंद कर दिया, जिससे उसके आठ प्रतिष्ठानों में पौधों पर आधारित व्यंजनों को बढ़ावा देने की उसकी प्रतिबद्धता कमजोर पड़ गई।

यह रुझान सुपरमार्केट की अलमारियों पर भी दिखाई दे रहा है। पौधों पर आधारित कई उत्पाद, जैसे ‘बर्ड्स आई’ की पौधों पर आधारित शृंखला सुपरमार्केट की दिग्गज कंपनी ‘वूलवर्थ्स’ के स्टोर से गायब हो रहे हैं। इसके विरोध में लोगों ने जन याचिकाएं दायर कीं और ‘वीगन ऑस्ट्रेलिया’, ‘वीगन सोसाइटी ऑफ आओटेरोआ’ तथा ‘डॉक्टर्स फॉर न्यूट्रिशन’ जैसे संगठनों ने औपचारिक पत्र भी लिखा।

हालांकि, वूलवर्थ्स ने एक बयान में कहा कि पौधों पर आधारित उत्पादों की ‘‘कम और लगातार घटती’’ बिक्री उसके इस फैसले की मुख्य वजह है।

ऐसा क्यों हो रहा है?

मांस और डेरी के विकल्पों की लोकप्रियता घटने के पीछे तीन संभावित कारण हो सकते हैं।

पहला, ऐसा लगता है कि इन उत्पादों का पारंपरिक जुड़ाव कम हो गया है। हाल के वर्षों में ‘प्रोटीन-मैक्सिंग’ जैसी जीवनशैली लोकप्रिय हुई है, जिसमें वजन घटाने या कसरत करने वालों के लिए अधिक से अधिक प्रोटीन लेने पर जोर दिया जाता है। इससे लोगों का ध्यान वैकल्पिक प्रोटीन से हटकर पशु-आधारित खाद्य पदार्थों पर केंद्रित हो गया है।

शोध से यह भी संकेत मिलता है कि सामाजिक धारणाएं भी इसमें भूमिका निभा रही हैं, खासकर मांस खाने को पुरुषत्व से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति के कारण। इसके अलावा, वजन घटाने वाली ‘जीएलपी-1’ दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल से भी उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है।

दूसरा, इस बात को लेकर बढ़ती चिंताएं भी मांग को प्रभावित कर रही हैं कि पौधों पर आधारित उत्पाद वास्तव में कितने स्वास्थ्यवर्धक हैं। शोध बताते हैं कि सभी वैकल्पिक प्रोटीन समान नहीं होते और इनमें से कुछ में सोडियम तथा अन्य योजक पदार्थों की मात्रा काफी अधिक होती है।

तीसरा, मांस और डेरी उद्योग अपने उत्पादों की छवि को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। वे खाद्य उत्पादन में पशुपालन की अहमियत को रेखांकित कर रहे हैं और जलवायु परिवर्तन पर इसके प्रभाव को कम करके दिखा रहे हैं। इसका असर उपभोक्ताओं और नीति निर्माताओं, दोनों के फैसलों पर पड़ रहा है, जो जलवायु संबंधी प्रयासों के लिहाज से चिंता का विषय है।

आगे क्या होगा?

कम से कम फिलहाल तो वैकल्पिक प्रोटीन उत्पादन का भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है।

यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस वर्ष मार्च में सीएसआईआरओ ने अपने खाद्य विज्ञान कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर कटौती की घोषणा की थी। इससे संकेत मिलता है कि वह अब ‘प्रिसिजन फर्मेंटेशन’ और वैकल्पिक प्रोटीन से जुड़े अन्य अनुसंधानों में निवेश कम कर रहा है।

‘प्रिसिजन फर्मेंटेशन’ ऐसी तकनीक है, जिसमें यीस्ट और कवक का इस्तेमाल कर ऐसे पशुजन्य प्रोटीन तैयार किए जाते हैं, जिनका स्वाद, बनावट और पोषण मूल्य असली मांस जैसा होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय विज्ञान एजेंसी के लिए अब वैकल्पिक प्रोटीन प्राथमिकता नहीं रह गए हैं।

यह बात स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलिया का पशुपालन उद्योग पहले से ही जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में पशु-आधारित प्रोटीन से दूर जाने की दलील पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गई है, लेकिन यदि मजबूत शोध और प्रभावी नीतियां नहीं होंगी, तो हो सकता है कि हम क्षणिक रुझानों के पीछे भागते हुए ‘‘धरती की सेहत’’ के साथ समझौता कर बैठें।

द कन्वरसेशन

खारी सुरेश

सुरेश