बंदर की विभिन्न प्रजातियां भी इनसानों की तरह अन्य पशुओं के साथ करती हैं तालमेल

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बंदर की विभिन्न प्रजातियां भी इनसानों की तरह अन्य पशुओं के साथ करती हैं तालमेल

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  • Publish Date - August 6, 2026 / 06:15 PM IST,
    Updated On - August 6, 2026 / 06:15 PM IST

(सिरिल ग्र्रूटर, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय)

ऑक्सफोर्ड, छह अगस्त (द कन्वरसेशन) मैंने जब पहली बार देखा, तो मुझे ठीक से समझ नहीं आया कि मैं क्या देख रहा हूं। दरअसल शंघाई चिड़ियाघर में ‘नॉर्दर्न व्हाइट-चीक्ड गिबन’ एक चूहे को पकड़े हुए था और उसे प्यार से सहला रहा था। वह चूहा भटककर उसके बाड़े में आ गया था। वह न तो उसे खाने की कोशिश कर रहा था और न ही उसे भगाने की। इसके बजाय, गिबन उस छोटे से चूहे के साथ बहुत ही नरमी से पेश आ रहा था। मैं सोचता ही रह गया कि यह व्यवहार क्यों।

सालों बाद, जब मैं दक्षिण-पश्चिम चीन के पहाड़ों में जंगली काले-और-सफेद चपटी नाक वाले बंदरों पर अध्ययन कर रहा था, तो मैंने देखा कि चंचल युवा बंदर बार-बार पालतू सूअरों की पीठ पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। सच कहूं तो, अलग-अलग प्रजातियों के बीच ऐसे संबंध देखने की मुझे उम्मीद नहीं थी।

मैंने अपने साथियों के साथ मिलकर एक नया अध्ययन किया है, जिसमें 1970 के दशक से लेकर 2025 तक के कालखंड में वानर (प्राइमेट्स) के दूसरी प्रजातियों के जीवों के साथ मेल-जोल के 427 दर्ज मामलों का विश्लेषण किया गया है। हमारे अध्ययन में सामने आया कि ये मेल-जोल वैज्ञानिकों की सोच से कहीं ज्यादा आम हैं।

सालों से, मैंने वैज्ञानिक पत्रिकाओं, तस्वीरों, वीडियो और दूसरे वानर विज्ञान विशेषज्ञों (प्राइमेटोलॉजिस्ट्स) के अनुभवों से ऐसी ही अंतर प्रजातीय संबंधों की रिपोर्ट एकत्र करने का कार्य किया। जो बातें शुरू में कुछ अजीब और अनोखे किस्से जैसी लगती थीं, वे धीरे-धीरे एक बड़ी परिपाटी में बदल गईं। ये मेल-जोल कपि प्रजातियों के व्यवहार के एक ऐसे पहलू को दिखाते हैं, जो हैरान करते हैं।

यह व्यवहार हमारी अपनी प्रजाति की एक खास विशेषता ‘दूसरी प्रजातियों के साथ हमारे असाधारण संबंध’ पर रोशनी डाल सकता है।

मुझे लंबे समय से इस बात में दिलचस्पी रही है कि सहनशीलता कैसे विकसित होती है, न केवल एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच, बल्कि आम तौर पर अजनबियों के बीच भी। इंसान इस मामले में अनोखे हैं कि हम उन लोगों के साथ भी सहयोग करते हैं जिनसे हमारा कोई संबंध नहीं होता। शायद हम पशुओं के साथ जो करीबी रिश्ते बनाते हैं, उस मामले में भी हम कुछ ज़्यादा ही अनोखे हैं।

वैज्ञानिकों को काफी पहले से जानकारी है कि अलग-अलग प्रजातियों के जानवर अक्सर एक-दूसरे के साथ रहते हैं। उदाहरण के लिए, जब बंदर अलग-अलग प्रजातियों के जानवरों के साथ मिलकर घूमते हैं, तो वे शिकारियों का पता बेहतर ढंग से लगा सकते हैं या उन्हें खाना तलाश करने के अधिक मौके मिल सकते हैं। एक और उदाहरण यह है कि पक्षी अक्सर जंगलों में बंदरों के पीछे-पीछे रहते हैं ताकि वे उन कीड़ों को खा सकें जो बंदरों की हलचल से बाहर निकल आते हैं।

लेकिन हमारा अध्ययन सामाजिक पारस्परिक प्रक्रिया पर केंद्रित था।

हमने जिन मामलों का विश्लेषण किया, उनमें 88 कपि (प्राइमेट)प्रजातियां और 127 अन्य जानवरों की प्रजातियों के साथ उनके आपसी संबंध शामिल थे। इन प्रजातियों की विविधता हैरान करने वाली थी। इनमें भेड़, टैपिर, हिरण, पालतू सूअर, बिल्लियां और कुत्ते जैसे स्तनधारी जीव, साथ ही उल्लू, छिपकली, मेंढक और यहां तक कि कीड़े-मकोड़े भी शामिल थे।

सबसे आम व्यवहार खेलना और एक-दूसरे की देखभाल करना था। लेकिन हमें ऐसी जानकारी भी मिलीं जिनमें प्राइमेट दूसरी प्रजाति के सदस्यों को साथ ले जाते, उनके साथ सटकर बैठते, खाना साझा करते और कभी-कभी उन्हें पालते हुए देखे गए। ज्यादातर संवाद या मेल-जोल की शुरुआत खुद कपि प्रजाति समूह के जानवरों ने की थी।

मेरे पसंदीदा उदाहरणों में से एक है हिम बंदर का सिका हिरणों की पीठ पर सवारी करना और उनकी देखभाल करना है। यह दो बहुत अलग प्रजातियों के बीच लंबे समय तक बार-बार शांतिपूर्ण ढंग से मेल-जोल का एक अद्भुत उदाहरण है।

मुझे कुछ ऐसी बातें भी बहुत दिलचस्प लगीं जो आम तौर पर देखने को नहीं मिलतीं, जैसे कि एक लंगूर का प्रेम से गिलहरी को सहलाना, एक सिल्वरबैक गोरिल्ला का सावधानी से एक छोटे जंगली बुशबेबी को गोद में लेना, एक बोनोबो (बौना चिम्पैंजी) का नेवले के बच्चे को धीरे से पकड़े रहना और मकाक बंदरों का आवारा कुत्तों के साथ खेलना।

इनमें से कई अंतःक्रियाएं समान प्रजातियों के भीतर वाले संबंध की तरह ही लाभ प्रदान करती हैं। इन अंत: क्रियाओं से परजीवियों को दूर करने, स्वच्छता में सुधार करने और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने में मदद मिलती है। खेल से शारीरिक समन्वय, सामाजिक कौशल और संज्ञानात्मक लचीलेपन के विकास में योगदान मिलता है।

कुछ मामलों में, प्राइमेट और दूसरे जानवर साथ में समय बिताते हैं, क्योंकि उन्हें भोजन तलाश करने के लिए एक जैसी जगहें मिलती हैं या शिकारियों से सुरक्षा मिलती है। उदाहरण के लिए, उष्ण कटिबंधीय इलाकों में रहने वाले कपि की एक प्रजाति दूसरी प्रजातियों के साथ मिलकर रहती हैं और पेड़ों की ऊपरी टहनियों में साथ मिलकर खाना ढूंढती हैं। ऐसे मामलों में, एक-दूसरे की देखभाल या खेलने-कूदने जैसे सामाजिक व्यवहार, बस बार-बार मिलने-जुलने और एक-दूसरे से परिचित होने की वजह से पैदा हो सकते हैं।

लेकिन सभी मामले इस व्याख्या के अनुकूल नहीं हैं। जैसे कोई लंगूर गिलहरी को सहलाता क्यों है, या मकाक बंदर आवारा कुत्तों की देखभाल क्यों करते हैं? ऐसी हरकतें बताती हैं कि कपियों की अलग-अलग प्रजातियों के प्रति सामाजिक लचीलेपन, उत्सुकता और सहनशीलता की क्षमता, अनुसंधानकर्ताओं की पिछली समझ से कहीं ज्यादा हो सकती है।

हमें यह भी पता चला कि कौन-किसके साथ घुलता-मिलता है, इसके कुछ खास पैटर्न हैं। कम उम्र के प्राइमेट के दूसरी प्रजाति के सदस्यों के साथ खेलने की संभावना ज़्यादा होती है, जबकि वयस्क मादाएं अक्सर एक-दूसरे की देखभाल में शामिल रहती हैं।

इन सभी संपर्कों को दोस्ती की मिसाल बताना आकर्षक लग सकता है, लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है।

कुछ बंदरों की प्रजातियों ने दूसरी प्रजाति के बच्चों को गोद लेने या उनकी देखभाल करने जैसे तरीकों से उन्हें अपने साथ रखा, लेकिन कभी-कभी उनके साथ सख्ती से पेश आने या उनकी अनदेखी करने के कारण उन्हें चोट लग जाती थी या उनकी मौत हो जाती थी। हमने ऐसे मामले भी देखे जिनमें कपियों ने किसी दूसरे समूह के छोटे जानवर का अपहरण कर लिया, जबकि कुछ मामलों में उनके साथ साफ तौर पर बुरा बर्ताव और हिंसा की गई।

चिड़ियाघरों और इंसानों की देखरेख वाली जगहों पर, कुछ प्रजातियां दूसरी प्रजातियों के जानवरों के साथ लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते बनाती दिखती हैं। इजराइल के एक चिड़ियाघर में रहने वाली ‘निव’ नाम की एक मकाक मादा बंदर ने 2017 में एक चूजे को अपनाया और उसकी अपने बच्चे की तरह ही परवरिश की।

हमने अपने अध्ययन में पाया कि यह अंत: क्रिया केवल वनमानुषों में अधिक आम नहीं हैं बल्कि प्राइमेट की सभी प्रजातियों में देखी गई हैं।

ये असामान्य घटनाएं दिलचस्प प्राकृतिक इतिहास से कहीं बढ़कर हैं।

जंगलों का विस्तार जैसे-जैसे खंडित होता जा रहा है और जंगली जानवरों को इंसानों और पालतू जानवरों के अधिक करीब आना पड़ रहा है, अलग-अलग प्रजातियों के बीच मेल-जोल के मौके तेजी से बदल रहे हैं। कपि (जैसे बंदर और लंगूर) का अब कुत्तों, बिल्लियों और इंसानों के साथ रहने वाले दूसरे जानवरों से पहले के मुकाबले अधिक आमना-सामना होता है।

इनमें से कुछ मेल-जोल नुकसान-रहित या लाभदायक भी हो सकते हैं। वहीं, कुछ मेल-जोल से जंगली जानवरों, पालतू जानवरों और इंसानों के बीच बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए, यह समझना कि अलग-अलग प्रजातियां कब और क्यों एक-दूसरे को बर्दाश्त करती हैं, संरक्षण और जन-स्वास्थ्य, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

अध्ययन के नतीजों से पशु कल्याण में सुधार लाने में भी मदद मिल सकती है। चिड़ियाघरों में अनुकूल प्रजातियों को एक साथ रखा जा रहा है, और यह समझना कि कौन सी प्रजातियां सकारात्मक संबंध बनाने की अधिक संभावना रखती हैं, प्रबंधकों को बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकता है।

इन सबसे अधिक दिलचस्प बात यह है कि हमारे अध्ययन के नतीजों से पता चलता है कि उन रिश्तों के पीछे मौजूद कुछ चीजों (जैसे जिज्ञासा, सहनशीलता, देखभाल और खेल-कूद) की जड़ें शायद विकासवादी इतिहास में बहुत गहरी हैं।

(द कन्वरसेशन)

धीरज वैभव

वैभव