एआई के जरिए ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ की अवधारणा पर मंथन, लेकिन कानूनी और नैतिक सवाल कायम

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एआई के जरिए ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ की अवधारणा पर मंथन, लेकिन कानूनी और नैतिक सवाल कायम

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  • Publish Date - February 4, 2026 / 02:12 PM IST,
    Updated On - February 4, 2026 / 02:12 PM IST

(वेलेट पॉटर, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू इंग्लैंड)

लंदन, चार फरवरी (द कन्वरसेशन) सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन क्या आप अपने निधन के बाद भी अपनों से बातचीत करने वाला अपना एक इंटरैक्टिव “डिजिटल ट्विन” बनाना चाहेंगे? जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने मृतकों को मानो फिर से जीवित कर देने की संभावना पैदा कर दी है। तथाकथित ‘ग्रीफबॉट’ या ‘डेथबॉट’ तेजी से बढ़ते डिजिटल आफ्टरलाइफ उद्योग में फैल रहे हैं, जिसे ‘ग्रीफ टेक’ भी कहा जाता है।

‘ग्रीफबॉट’ या ‘डेथबॉट’ किसी मृत व्यक्ति के डेटा पर आधारित एआई-जनित आवाज, वीडियो या टेक्स्ट चैटबॉट होते हैं।

आमतौर पर ऐसे डेथबॉट शोकाकुल परिजनों द्वारा बनाए जाते हैं और यह शोक की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। हालांकि अब ऐसी सेवाएं भी उपलब्ध हैं, जिनके जरिए कोई व्यक्ति अपने जीवित रहते ही अपना ‘डिजिटल ट्विन’ तैयार कर सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि भविष्य के लिए अभी से ऐसा क्यों न किया जाए?

नई तकनीक के हर तरह से इस्तेमाल की तरह, डिजिटल अमरता की यह अवधारणा भी कई कानूनी सवाल खड़े करती है—और इनमें से अधिकांश के स्पष्ट जवाब फिलहाल मौजूद नहीं हैं।

किसी कंपनी को मृत्यु के बाद व्यक्ति का ‘डिजिटल सिमुलेशन’ बनाने की अनुमति देना एक संवेदनशील मामला है। यह स्थिति उस मामले से अलग है, जिसमें बिना सहमति के किसी मृत व्यक्ति की डिजिटल नकल बनाई जाती है, क्योंकि इस मामले में व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले ही अनुबंध के तहत डेटा उपयोग की अनुमति देता है।

इसके बावजूद कई सवाल अनसुलझे हैं—डिजिटल ट्विन पर कॉपीराइट किसका होगा, निजता का संरक्षण कैसे होगा, यदि कंपनी बंद हो जाए या तकनीक पुरानी हो जाए तो डेटा का क्या होगा, और क्या इस डिजिटल प्रतिरूप का अंत भी किसी समय माना जाएगा?

ऑस्ट्रेलियाई कानून के संदर्भ में देखें तो वहां का कानून फिलहाल किसी व्यक्ति की पहचान, आवाज, मौजूदगी या व्यक्तित्व पर अलग से कानूनी स्वामित्व की मान्यता नहीं देता है। अमेरिका के विपरीत, ऑस्ट्रेलिया में ‘पब्लिसिटी’ या ‘पर्सनैलिटी राइट’ जैसा कोई व्यापक अधिकार नहीं है। कॉपीराइट कानून भी केवल भौतिक रूप में मौजूद कृतियों पर लागू होता है। एआई को प्रशिक्षित करने के लिए दी गई आवाज की रिकॉर्डिंग या लिखित सामग्री पर संरक्षण संभव है, लेकिन पूरी तरह एआई-जनित आउटपुट को मौजूदा कानून में लेखकविहीन माना जा सकता है।

नैतिक दृष्टि से भी जोखिम मौजूद हैं। एआई आधारित ‘डिजिटल ट्विन’ समय के साथ मूल व्यक्ति के विचारों, मूल्यों या व्यक्तित्व से भटक सकता है। इससे परिजनों को मानसिक पीड़ा हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि यह तकनीक शोक से उबरने में मदद कर सकती है, लेकिन इसके प्रभावों पर अभी पर्याप्त शोध नहीं हुआ है। साथ ही, परिजनों द्वारा एआई संस्करण पर अत्यधिक निर्भरता का खतरा भी बना रहता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि उभरते ‘ग्रीफ टेक’ उद्योग में स्पष्ट नियम-कानून और नियमन की आवश्यकता है। फिलहाल, जो लोग ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ बनाने पर विचार कर रहे हैं, उनके लिए यह जरूरी है कि वे सेवाओं की शर्तों और अनुबंधों को सावधानी से पढ़ें, क्योंकि भविष्य में वही उनके अधिकारों और सीमाओं को तय करेंगे।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा अमित

अमित