आईवीएफ परीक्षण के जरिए बच्चे के लंबे या होशियार होने के पूर्वानुमान जैसे सपने बेचे जा रहे हैं

आईवीएफ परीक्षण के जरिए बच्चे के लंबे या होशियार होने के पूर्वानुमान जैसे सपने बेचे जा रहे हैं

आईवीएफ परीक्षण के जरिए बच्चे के लंबे या होशियार होने के पूर्वानुमान जैसे सपने बेचे जा रहे हैं
Modified Date: February 10, 2026 / 11:50 am IST
Published Date: February 10, 2026 11:50 am IST

( एलेक्स पॉलिआकोव, मेलबर्न यूनिवर्सिटी )

मेलबर्न, 10 फरवरी (द कन्वरसेशन) अपनी होने वाली संतान को लेकर संभावित माता-पिता पहले ही रोमांचित रहते हैं। अब उन्हें ऐसी आनुवंशिक जांचों के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है, जिनमें आईवीएफ के जरिए तैयार किये गए भ्रूण की विशेषताएं बताने का दावा किया जाता है जैसे कौन सा बच्चा सबसे लंबा, सबसे बुद्धिमान या सबसे स्वस्थ बनेगा।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ये जांच अपने वादों को पूरा नहीं कर सकतीं। इनके लाभ बेहद सीमित हैं, जबकि मरीजों, बच्चों और समाज के लिए इससे जुड़े जोखिम वास्तविक और गंभीर हैं। विशेषज्ञों की राय है कि माता-पिता को अपने भावी बच्चों से जुड़े अहम फैसले लेते समय भ्रामक प्रचार नहीं, बल्कि सटीक जानकारी मिलनी चाहिए।

फिलहाल आईवीएफ के जरिए विकसित भ्रूणों की जांच कुछ आनुवंशिक बीमारियों से बचाव के लिए की जाती है, जो आमतौर पर एकल जीन से जुड़ी होती हैं, जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस। लेकिन हाल के वर्षों में सामने आई यह नई जांच हजारों जीनों के संयुक्त प्रभाव से जुड़े जटिल गुणों का अनुमान लगाने का दावा करती है।

नई तकनीक में भ्रूणों के लिए तथाकथित ‘पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर’ तैयार किए जाते हैं, जिनके आधार पर हृदय रोग, अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों या बुद्धिमत्ता और कद जैसे गुणों का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

ऑस्ट्रेलिया में ऐसी जांच उपलब्ध नहीं है, लेकिन अमेरिका की कई कंपनियां यह सुविधा दे रही हैं। कुछ कंपनियां भ्रूणों की हजारों विशेषताओं की जांच करने का दावा करती हैं और धुआंधार विज्ञापन के जरिए माता-पिता को आकर्षित कर रही हैं।

विशेषज्ञों के एक समूह ने इस तकनीक का मूल्यांकन किया और पाया कि इन जांचों से मिलने वाले पूर्वानुमान बेहद अनिश्चित हैं। गणितीय विश्लेषण के अनुसार, इससे होने वाला संभावित लाभ नगण्य है, जैसे आईक्यू में कुछ अंकों की बढ़ोतरी या कद में एक से तीन सेंटीमीटर का अंतर। इसके अलावा, देर से सामने आने वाली बीमारियों के बारे में वास्तविक लाभ का आकलन करना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि उनके परिणाम दशकों बाद सामने आएंगे।

शोधकर्ताओं ने कहा कि पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर उन लोगों के आंकड़ों पर आधारित हैं, जो आज 50-60 वर्ष की उम्र में हैं और जिन्होंने पूरी तरह अलग सामाजिक, पर्यावरणीय और जीवनशैली स्थितियों में जीवन बिताया है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के गुण और बीमारियां जीन और पर्यावरण के आजीवन पारस्परिक प्रभाव का नतीजा होती हैं, जिसे केवल आनुवंशिक जांच से नहीं समझा जा सकता।

विशेषज्ञों ने उदाहरण देते हुए कहा कि बच्चे की बुद्धिमत्ता पर शुरुआती शिक्षा, पोषण, पारिवारिक सहयोग और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का गहरा असर पड़ता है। केवल आनुवंशिक स्कोर के आधार पर भविष्य की बुद्धिमत्ता तय करना व्यावहारिक नहीं है।

शोध में यह भी चेतावनी दी गई कि एक ही जीन कई गुणों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में किसी एक सकारात्मक गुण के चयन से अनजाने में किसी अन्य बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है।

ऑस्ट्रेलिया में मौजूदा दिशा-निर्देश गंभीर आनुवंशिक बीमारियों से बचाव के लिए भ्रूण जांच की अनुमति देते हैं, लेकिन पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर भविष्य के संभावित जोखिमों का अनुमान मात्र हैं, न कि चिकित्सीय निदान। ऐसे में इनका उपयोग नियामकीय अस्पष्टता के दायरे में आता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि इस तकनीक से जुड़े नैतिक सवाल भी गंभीर हैं और यह सामाजिक असमानताओं और भेदभाव को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने चेताया कि केवल इन जांचों के लिए आईवीएफ कराना, बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के, स्वस्थ बच्चे की संभावना को भी कम कर सकता है, क्योंकि आईवीएफ प्रक्रिया स्वयं कुछ जोखिमों से जुड़ी होती है।

उनका कहना है कि ‘‘सबसे अच्छा’’ बच्चा वह नहीं होता जिसका आनुवंशिक स्कोर सबसे ऊंचा हो, बल्कि वह होता है जो प्यार, अच्छे पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं वाले माहौल में जन्म लेता है।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा वैभव

वैभव


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