फीफा विश्व कप से इंग्लैंड बाहर, लेकिन टीम ने देश की पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने में मदद की
फीफा विश्व कप से इंग्लैंड बाहर, लेकिन टीम ने देश की पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने में मदद की
(माइकल स्की, लफबरो विश्वविद्यालय)
लफबरो (ब्रिटेन), 16 जुलाई (द कन्वरसेशन) फुटबॉल विश्व कप को अक्सर किसी देश के विभिन्न समूहों को एकजुट करने के अवसर के रूप में देखा जाता है, जहां लोग अपनी टीम की उपलब्धियों का जश्न मनाते हैं।
इंग्लैंड की युवा और ऊर्जावान टीम भले ही फाइनल तक नहीं पहुंच सकी लेकिन उसके प्रदर्शन का जश्न मनाने के लिए कई बातें हैं।
थॉमस ट्यूशेल की टीम ने इंग्लैंड की ऐसी तस्वीर पेश की, जो अक्सर पुरानी यादों और संकीर्ण सोच से जुड़ी ‘डाउनटन एबे’ जैसी सांस्कृतिक छवियों से बिल्कुल अलग है।
इस टीम ने हाल के दिनों में अंग्रेजियत की परंपरा से हटकर और जातीय पहचान को लेकर किए गए दावों को भी सीधे चुनौती दी।
जर्मन कोच द्वारा चुनी गई 26 सदस्यीय टीम में 20 ऐसे खिलाड़ी शामिल थे, जिनके पास खेल में किसी अन्य देश का प्रतिनिधित्व करने का विकल्प भी था।
ऐसा इसलिए क्योंकि फुटबॉल की वैश्विक संस्था फीफा के नियमों के तहत खिलाड़ी अपने माता-पिता या दादा-दादी के जन्म वाले देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
लेकिन जमैका, नाइजीरिया, घाना, आयरलैंड और केन्या जैसे देश विकल्प के रूप में कोई संयोग नहीं हैं। ये उन देशों की सूची है, जो कभी इंग्लैंड (और बाद में ब्रिटेन) के उपनिवेश रहे या उसके औपनिवेशिक प्रभाव में थे। श्रीलंकाई उपन्यासकार ए. सिवानंदन के शब्दों में, ”वे यहां हैं, क्योंकि कभी आप वहां थे।”
इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले इन खिलाड़ियों ने देशभर में व्यापक समर्थन हासिल किया और उत्साह का संचार किया।
आंकड़े बताते हैं कि टीम के सफर को रिकॉर्ड संख्या में लोगों ने देखा और देशभर में प्रशंसकों के जश्न के वीडियो सोशल मीडिया पर छाए रहे, जिसमें बीयर उछालने जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं।
हालांकि, आयरिश प्रवासियों के पोते हैरी केन की अगुवाई वाली और केन्या तथा आयरलैंड से आए प्रवासी परिवारों के बेटे जूड बेलिंगहम से प्रेरित इस टीम की उपलब्धियां देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए कुछ अलग नजर आ सकती हैं। दक्षिणपंथी लोकलुभावन राजनीति के उभार के साथ विरासत और जन्मस्थान जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
अंग्रेज या ब्रिटिश?
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यह टीम अंग्रेज़ियत की ऐसी तस्वीर भी पेश करती है, जो व्यापक जनमानस की सोच से मेल नहीं खाती। एक ओर, आधिकारिक सर्वेक्षण लगातार बताते रहे हैं कि जातीय अल्पसंख्यकों द्वारा अपनी पहचान का ‘अंग्रेज़’ के बजाय ‘ब्रिटिश’ के रूप में उल्लेख करना कहीं अधिक स्वीकार्य और आकर्षक लगता है। इसका कारण संभवतः यह है कि फुटबॉल से इतर कई अल्पसंख्यक समुदायों के लिए अंग्रेजियत एक ऐसी पहचान रही है, जो नागरिकता आधारित जुड़ाव के बजाय जातीय पहचान पर अधिक केंद्रित और सीमित रही है।
दूसरी ओर, पहचान से जुड़े ये सवाल उन लोगों के बीच भी दिखाई देते हैं, जिनका राजनीतिक झुकाव दक्षिणपंथ की ओर है।
ऐसे समूह खुद को ब्रिटिश की तुलना में अधिक अंग्रेज मानने की संभावना रखते हैं।
दोनों आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर अपनेपन और जुड़ाव की व्यवस्था पर मेरे अध्ययन से जुड़े हैं।
यह तर्क दिया जाता है कि किसी राष्ट्र के भीतर कुछ ऐसे समूह होते हैं, जिन्हें दूसरों की तुलना में अधिक ‘‘अपना’’ माना जाता है।
जो लोग बिना किसी सवाल के खुद को उस राष्ट्र का वास्तविक हिस्सा मानते हैं और जिन्हें इसी तरह स्वीकार भी किया जाता है, वे खुद को देश के सही प्रतिनिधि और उसके संसाधनों के निर्णायक के रूप में स्थापित करने लगते हैं।
इससे न केवल उन्हें अपने जीवन और समाज पर प्रभाव डालने का एहसास मिलता है, ऐसे समय में जब बड़ी संख्या में लोग खुद को व्यवस्था से कटा और बेअसर महसूस कर रहे हैं, बल्कि इससे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार के मजबूत दावे करने का आधार भी मिलता है। अपनापन और अधिकार-बोध के बीच गहरा संबंध होता है। इसलिए ‘इस समाज पर मेरा हक़ तुमसे ज़्यादा है’ जैसी भावना आगे चलकर ‘मैं तुमसे ज़्यादा पाने का हक़दार हूं’ में भी बदल सकती है।
एक ही राष्ट्र के भीतर विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष कोई नई बात नहीं है। लेकिन बढ़ती असमानता और राजनीति तथा मीडिया से जुड़ी सामूहिक संस्थाओं के कमजोर होने से ये मतभेद बहुत अधिक तीखे हो गए हैं।
इन प्रक्रियाओं की एक प्रमुख विशेषता मूलनिवासी सोच और नीतियों का बढ़ना है, जिनमें प्रवासियों की तुलना में देश में जन्मे लोगों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जाती है।
एक नया इंग्लैंड?
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हालांकि, इंग्लैंड के लिए इस स्थिति को बदलना संभव है। गौर करने वाली बात यह है कि वेल्स और स्कॉटलैंड में रहने वाले जातीय अल्पसंख्यक खुद को ‘ब्रिटिश’ के बजाय ‘वेल्श’ या ‘स्कॉटिश’ कहने की कहीं अधिक संभावना रखते हैं। इसकी वजह यह है कि इन राष्ट्रीय पहचान की परिभाषा मुख्यतः ब्रिटेन के प्रभुत्वशाली समूह—यानी अंग्रेज़ों—के संदर्भ में तय होती है।
इंग्लैंड के क्षेत्रों को अधिक अधिकार देने की प्रक्रिया दक्षिण-पश्चिम, मिडलैंड्स और उत्तर के इलाकों में असंतोष को दूर करने में मदद कर सकती है।
इसके अलावा, विशिष्ट अंग्रेजी सांस्कृतिक संस्थाएं जैसे अंग्रेजी राष्ट्रीय संग्रहालय, पुस्तकालय और प्रसारक की स्थापना अपनेपन और जुड़ाव की नई भावना को बढ़ावा दे सकती हैं।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंग्लैंड और वहां के लोगों को अपनी पहचान को लेकर कुछ अधिक विश्वसनीय और प्रासंगिक कहानियां बताने की जरूरत है।
ये कहानियां अतीत और पूर्व की ‘‘महान उपलब्धियों’’ के प्रति अत्यधिक लगाव से आगे बढ़ सकती हैं।
ऐसी ही एक कहानी इंग्लैंड की इस फुटबॉल टीम से जुड़ी हो सकती है।
आखिरकार, यह टीम भले ही इस विश्व कप को जीत नहीं सकी लेकिन उसने राष्ट्र का एक अलग और बेहद स्पष्ट समावेशी प्रतिनिधित्व जरूर पेश किया है।
द कन्वरसेशन जितेंद्र पवनेश
पवनेश

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