(क्लेयर ओ’टूल, वोलोंगोंग विश्वविद्यालय)
वोलोंगोंग (ऑस्ट्रेलिया), 24 मार्च (द कन्वरसेशन) ध्यान-अभाव अतिसक्रियता विकार (एडीएचडी) एक ऐसी स्थिति है, जो बचपन में विकसित होती है और 6-10 प्रतिशत बच्चों तथा 2-6 प्रतिशत वयस्कों को प्रभावित करती है।
एडीएचडी से पीड़ित लोगों में या तो मुख्य रूप से ध्यान न देने के लक्षण (जैसे एकाग्रता की कमी), मुख्य रूप से अतिसक्रिय और आवेगी लक्षण (जैसे बिना सोचे-समझे बोलना या कार्य करना), या दोनों का संयोजन होता है।
एडीएचडी से पीड़ित दो व्यक्तियों के लक्षण और अनुभव बहुत अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए, इस स्थिति का निदान करने वाले चिकित्सकों के पास सही ज्ञान और विशेषज्ञता होना महत्वपूर्ण है।
लेकिन हमारे नए शोध में पाया गया कि एडीएचडी का आकलन करने वाले आधे मनोवैज्ञानिक नैदानिक दिशानिर्देशों या मानदंडों का पालन नहीं करते।
एडीएचडी का निदान कैसे किया जाता है?
एडीएचडी का निदान वर्तमान में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा किया जाता है। क्वींसलैंड के सामान्य चिकित्सक भी एडीएचडी का निदान कर सकते हैं, और भविष्य में अन्य राज्यों तथा क्षेत्रों में भी यह सुविधा उपलब्ध होगी।
एडीएचडी का निदान रक्त परीक्षण या किसी अन्य माप से नहीं किया जा सकता। इसके लिए नैदानिक निर्णय के साथ-साथ कई कारकों और सूचना स्रोतों पर विचार करना आवश्यक होता है।
चिकित्सा संबंधी आकलन का उपयोग उन अन्य कारकों को खारिज करने के लिए किया जाना चाहिए, जो एडीएचडी के समान प्रतीत हो सकते हैं, जैसे कि संवेदी हानि, थायरॉइड रोग, एनीमिया या दवा के दुष्प्रभाव।
चिकित्सक को व्यक्ति के लक्षणों के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और नैदानिक संदर्भ पर भी विचार करना चाहिए। इसके लिए एक से अधिक परिवेश और व्यक्तियों, जैसे कि शिक्षक या परिवार के सदस्य, से जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। मूल्यांकन केवल प्रश्नावली या व्यक्ति को देखकर ही नहीं किया जाना चाहिए।
एडीएचडी का निदान मानसिक विकारों के निदान और सांख्यिकी मैनुअल (डीएसएम 5) या रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीडी) के नैदानिक मानदंडों के अनुसार किया जाना चाहिए।
इनमें ऐसी अक्षमताएं शामिल हैं, जो व्यक्ति की उम्र के अनुरूप नहीं हैं, जो 12 वर्ष की आयु से पहले शुरू हुई थीं, और जिनका प्रभाव घर, स्कूल या कार्यस्थल जैसे कई परिवेशों पर पड़ता है।
व्यवहार में, एडीएचडी के व्यापक मूल्यांकन में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:
1) किसी व्यक्ति और उसके परिवार के सदस्य के साथ साक्षात्कार जिसमें उनके इतिहास और वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी शामिल हो।
2) स्कूल रिपोर्ट की समीक्षा
3) निदान को स्पष्ट करने में सहायता के लिये प्रश्नावली को पूरा करना।
4) किसी भी चिकित्सीय समस्या की जांच करना जो एडीएचडी जैसे लक्षणों का कारण बन सकती है।
हमारा अध्ययन
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हमारे हालिया अध्ययन में एडीएचडी के निदान और उपचार में शामिल 322 ऑस्ट्रेलियाई मनोवैज्ञानिकों की एक ऑनलाइन प्रश्नावली का उपयोग किया गया।
हम यह देखना चाहते थे कि वे इसका आकलन कैसे कर रहे हैं, क्या यह ऑस्ट्रेलियाई दिशानिर्देशों से मेल खाता है, और वे नैदानिक मानदंडों को कितनी अच्छी तरह जानते हैं।
मनोचिकित्सकों और बाल रोग विशेषज्ञों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं की कम संख्या के कारण और अन्य विशेषज्ञों की तुलना में मनोवैज्ञानिकों की संख्या अधिक होने के कारण, यह अध्ययन केवल मनोवैज्ञानिकों तक ही सीमित था।
यह अध्ययन गुमनाम रूप से स्वयं द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित था। इससे इस बात की संभावना कम हो गई कि केवल सबसे आत्मविश्वासी लोग ही इसमें भाग लेंगे, या चिकित्सक केवल अपनी छवि सुधारने पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
लेकिन इस बात की संभावना है कि मनोवैज्ञानिक अपने आकलन को सटीक रूप से याद न रख पाएं, या प्रश्नावली पर उतना प्रयास न करें, जितना वे किसी ग्राहक के लिए करते हैं।
हमें क्या मिला
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तीन चौथाई मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि वे हमेशा दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं, और कई अन्य ने कहा कि वे कभी-कभी उनका पालन करते हैं। लेकिन कुल मिलाकर, आधे से भी कम मनोवैज्ञानिकों ने ऐसी मूल्यांकन पद्धतियों की जानकारी दी, जो वास्तव में दिशा-निर्देशों का पालन करती थीं।
इससे यह पता चलता है कि मूल्यांकन कराने वाले लोग किसी चिकित्सक के इस आश्वासन पर भरोसा नहीं कर सकते कि वे दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं और उन्हें विशेष रूप से यह पूछने की आवश्यकता है कि इसमें क्या शामिल है।
लगभग सभी मनोवैज्ञानिकों ने ‘क्लाइंट’ के साक्षात्कार लिए और उनके विकासात्मक इतिहास की जानकारी जुटाई। हालांकि, केवल तीन-चौथाई ने ही मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन पूरा किया। एक तिहाई से भी कम ने अन्य बीमारियों का आकलन किया। किसी ने भी संवेदी आकलन करने की जानकारी नहीं दी।
इससे किसी अन्य स्थिति का निदान करना या लक्षणों के अन्य संभावित कारणों को खारिज करना कहीं अधिक कठिन हो जाता है।
हालांकि, एडीएचडी को स्कूल में कम अंकों से जोड़ा जाता है, लेकिन यह निदान के लिए अनिवार्य नहीं है। कोई व्यक्ति सीखने में कठिनाइयों का अनुभव किए बिना भी एडीएचडी मानदंडों के दायरे में आ सकता है।
किसी विशिष्ट अधिगम विकार से पीड़ित बच्चों में भी एडीएचडी हो सकता है, और यह महत्वपूर्ण है कि इन अधिगम संबंधी कठिनाइयों का भी पता लगाया जाए।
(द कन्वरसेशन)
नेत्रपाल दिलीप
दिलीप