कमजोर मानसून के बावजूद हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में सूखा और अचानक बाढ़ का दोहरा खतरा: रिपोर्ट

कमजोर मानसून के बावजूद हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में सूखा और अचानक बाढ़ का दोहरा खतरा: रिपोर्ट

कमजोर मानसून के बावजूद हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में सूखा और अचानक बाढ़ का दोहरा खतरा: रिपोर्ट
Modified Date: June 11, 2026 / 02:07 pm IST
Published Date: June 11, 2026 2:07 pm IST

(शिरीष बी. प्रधान)

काठमांडू, 11 जून (भाषा) हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र को वर्ष 2026 के मानसून मौसम में सूखे और अचानक आने वाली बाढ़, दोनों तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है, भले ही कई देशों में वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान है। यह बात बृहस्पतिवार को जारी एक नयी रिपोर्ट में सामने आयी है।

एचकेएच क्षेत्र को अक्सर एशिया का ‘जल-स्तंभ’ कहा जाता है और यह आठ देशों- अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमा, नेपाल और पाकिस्तान में फैला हुआ है तथा लगभग दो अरब लोगों को मीठे पानी के संसाधन उपलब्ध कराता है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) द्वारा जारी ‘हिंदू कुश हिमालय मानसून आउटलुक 2026’ रिपोर्ट में भूटान, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम मानसूनी वर्षा का अनुमान जताया गया है, जबकि क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना जताई गई है।

हालांकि, वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि कमजोर मानसून का मतलब हमेशा आपदा जोखिमों में कमी नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक और तीव्र वर्षा के कारण अचानक बाढ़, भूस्खलन और अन्य खतरों का जोखिम बना रहता है।

आईसीआईएमओडी के जलविज्ञानी मनीष श्रेष्ठ ने कहा, ‘‘कमजोर मानसून के बावजूद थोड़े समय में होने वाली तीव्र वर्षा एक बड़ी चिंता बनी रहती है।’’ उन्होंने समुदायों और प्रशासन से अल्पकालिक पूर्वानुमानों और चेतावनियों पर नजर रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब एचकेएच क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ रही है। यह क्षेत्र वैश्विक औसत से तेज गति से गर्म हो रहा है और हाल के वर्षों में यहां बाढ़, भूस्खलन, हिमनदीय झील फटने से आने वाली बाढ़ और लंबे सूखे जैसी चरम मौसम घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।

क्षेत्रीय जलवायु निकाय की रिपोर्ट के अनुसार, लंबे सूखे के बाद अचानक भारी वर्षा की घटनाएं एक ही मौसम में सूखे और बाढ़ दोनों की संभावना बढ़ा सकती हैं। इस प्रकार की वर्षा पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र में अचानक बाढ़ और भूस्खलन को जन्म दे सकती है।

मनीष श्रेष्ठ ने कहा, ‘‘कुल मिलाकर मानसून अधिक शुष्क रहने की संभावना है, लेकिन इसका मतलब जोखिम कम होना नहीं है। कम समय में होने वाली तीव्र वर्षा गंभीर आपदाओं को जन्म दे सकती है।’’

एचकेएच क्षेत्र का गर्म होना वैश्विक जलवायु के लिए भी महत्वपूर्ण प्रभाव रखता है। यह क्षेत्र भारतीय मानसून को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन मानसून को और प्रभावित कर सकता है, जो पहले से ही अपने विस्तार और वर्षा वितरण के स्वरूप में बदलाव दिखा रहा है।

वैज्ञानिकों ने मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली और प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान की भी आवश्यकता जताई है।

आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ सलाहकार अरुण भक्त श्रेष्ठ ने कहा, ‘‘सूखा और बाढ़ के जोखिमों का प्रबंधन अब अलग-अलग नहीं किया जा सकता। बढ़ती जटिल आपदाओं से निपटने के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली, अल्पकालिक पूर्वानुमान और स्थानीय स्तर पर तैयारी का समन्वय जरूरी है।’’

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता के बीच सरकारों और समुदायों को एक ही प्रकार की आपदा के बजाय एक साथ कई खतरों से निपटने के लिए तैयारी करनी होगी।

भाषा अमित वैभव

वैभव


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