क्या चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालना अंतरिक्ष अन्वेषण का भविष्य है?

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क्या चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालना अंतरिक्ष अन्वेषण का भविष्य है?

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  • Publish Date - May 27, 2026 / 04:34 PM IST,
    Updated On - May 27, 2026 / 04:34 PM IST

( जैक रॉबिनॉट – यूनिवर्सिटी ऑफ परपिग्नान, एलेक्सिस पाइलेट, स्टीफन एब्नाडेस, सिल्वैन रोडेट – फ्रेंच नेश्नल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च )

पेरिस, 27 मई (द कन्वरसेशन) अमेरिका और चीन के बीच चंद्रमा तक पहुंचने की नई होड़ शुरू हो चुकी है, लेकिन इस बार उद्देश्य केवल वहां उतरकर लौट आना नहीं, बल्कि स्थायी मानव उपस्थिति के लिए आधार तैयार करना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, चंद्रमा को अब ऐसी तकनीकों के परीक्षण स्थल के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में मंगल ग्रह सहित दूरस्थ अंतरिक्ष अभियानों को संभव बना सकें।

इन प्रमुख तकनीकों में से एक ‘इन-सिटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन’ (आईएसआरयू) है, जिसमें किसी स्थान पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग वहीं मानव गतिविधियों के लिए आवश्यक वस्तुएं तैयार करने में किया जाता है। इनमें ऑक्सीजन, पानी, रॉकेट ईंधन या निर्माण सामग्री शामिल हैं।

इन आवश्यक संसाधनों का उत्पादन सीधे चंद्रमा पर करने से पृथ्वी से भेजे जाने वाले माल का भार काफी कम किया जा सकेगा, जिससे अंतरिक्ष अन्वेषण की लॉजिस्टिक और वित्तीय लागत में कमी आएगी।

आईएसआरयू के जरिए ऑक्सीजन, पानी, रॉकेट ईंधन और निर्माण सामग्री जैसी आवश्यक चीजें सीधे चंद्रमा पर तैयार की जा सकती हैं। इससे पृथ्वी से भेजे जाने वाले सामान का भार और अंतरिक्ष अभियानों की लागत काफी कम हो सकती है। पृथ्वी से ये संसाधन भेजने के बजाय लक्ष्य यह सीखना है कि चंद्रमा पर कैसे रहा जाए।

वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक, चंद्रमा की सतह पर मौजूद ‘रेगोलिथ’ यानी धूल और पत्थर के महीन कणों से ऑक्सीजन निकालना है। रेगोलिथ में ऑक्सीजन धात्विक ऑक्साइड के रूप में मौजूद होती है और इसकी कुल मात्रा लगभग 40 से 45 प्रतिशत तक होती है। हालांकि यह गैसीय रूप में नहीं होती, इसलिए इसे मुक्त करने के लिए ‘रासायनिक बॉन्ड’ को तोड़ना पड़ता है।

इसके लिए वैज्ञानिक ‘पायरोलिसिस’ तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसमें अत्यधिक तापमान पर पदार्थों को गर्म कर उनके रासायनिक अवयवों को अलग किया जाता है। चंद्रमा पर यह तापीय ऊर्जा सौर किरणों को दर्पणों या लेंसों की मदद से एक बिंदु पर केंद्रित कर प्राप्त की जा सकती है, जहां तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि चंद्रमा का वातावरण इस प्रक्रिया के लिए अनुकूल है, क्योंकि वहां लगभग निर्वात जैसी स्थिति है और वातावरण नहीं होने से सूर्य की किरणें बिना अवरोध सीधे सतह तक पहुंचती हैं। दक्षिणी ध्रुव के कुछ क्षेत्रों में लगभग 90 प्रतिशत समय तक सूर्य का प्रकाश उपलब्ध रहता है।

फ्रांस के ‘प्रोसेसेज, मैटेरियल्स एंड सोलर एनर्जी लैबोरेटरी’ (प्रोमेस-सीएनआरएस) के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का प्रारंभिक सफल परीक्षण किया है। फ्रांसीसी पिरेनीज पर्वत क्षेत्र के ओडियोलो में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी सौर भट्टी में वैज्ञानिकों ने चंद्र मिट्टी के कृत्रिम नमूनों पर प्रयोग किए।

शोधकर्ताओं ने बताया कि दो मीटर व्यास वाली परवलयाकार संरचनाएं सूर्य की रोशनी को लगभग 10,000 गुना तक केंद्रित कर 3,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान उत्पन्न कर सकती हैं। इसी ऊर्जा से पायरोलिसिस रिएक्टर संचालित किया गया।

प्रारंभिक परीक्षणों में 3.38 ग्राम रेगोलिथ नमूने से लगभग 35 मिलीग्राम ऑक्सीजन निकाली गई, जो कुल द्रव्यमान का लगभग एक प्रतिशत है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अभी शुरुआती स्तर की सफलता है और भविष्य में दबाव तथा तापमान नियंत्रण में सुधार कर उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस प्रक्रिया से केवल ऑक्सीजन ही नहीं, बल्कि अन्य खनिज पदार्थ भी प्राप्त किए जा सकते हैं, जिनका उपयोग चंद्रमा पर निर्माण सामग्री, उपकरण और ढांचे तैयार करने में किया जा सकता है। इससे भविष्य के चंद्र अभियानों की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

हालांकि वैज्ञानिकों ने माना कि इस तकनीक को वास्तविक चंद्र परिस्थितियों में लागू करने से पहले कई तकनीकी चुनौतियां बाकी हैं। रिएक्टर, दर्पण और सौर ऊर्जा केंद्रित करने वाले उपकरणों को चंद्रमा की कठोर परिस्थितियों जैसे विकिरण, अत्यधिक तापमान परिवर्तन और महीन धूल का सामना करने लायक बनाना होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह तकनीक सफल होती है तो भविष्य में चंद्र आधारों को पृथ्वी पर निर्भरता कम करने और लंबे अंतरिक्ष अभियानों को संभव बनाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।

द कन्वरसेशन मनीषा माधव

माधव