Kuwait dinar most powerful currency in the world most expensive currency

Most powerful currency: ये है विश्व की सबसे महंगी और ताकतवर करंसी, डालर भी है इसके आगे कमजोर

Most powerful currency in the world:आमतौर पर लोगों को यहीं मालूम रहता है कि डॉलर दुनिया की सबसे महंगी करंसी है। जबकि ऐसा नहीं है।

Edited By: , October 3, 2022 / 12:08 PM IST

नई दिल्ली। Most powerful currency in the world:आमतौर पर लोगों को यहीं मालूम रहता है कि डॉलर दुनिया की सबसे महंगी करंसी है। जबकि ऐसा नहीं है। विश्व में और भी करंसी हैं, जो डॉलर से महंगी हैं। जिनके बारे में आप शायद ही जानते होंगे, तो आइए हम आज बताते हैं कौन सी करंसी डॉलर से महंगी है। दुनिया की सबसे ताकतवर करंसी की बात करें, तो कुवैत की मुद्रा यानी कुवैती दीनार दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा है। अगर इसके 1 दीनार की कीमत को देखें तो ये इस समय यानी 2 अक्टूबर 2022 को भारत के करीब 263.41 रुपये के बराबर है। यानी आप 263.41 रुपये खर्च करेंगे तो आपको 1 दीनार मिल पाएगा। अगर भारतीय रुपये की तुलना में डॉलर को देखें तो ये 1 डॉलर की कीमत 81.64 रुपए है।

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बता दें कि रुपये की तुलना ज्यादातर डॉलर से ही होती है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर भी हुआ है। इसे लेकर आए दिन खबरें भी आती रहती हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत कम हुई। जब किसी देश की करेंसी की कीमत कमजोर होती है तो उसके कई नुकसान भी होते हैं। कुवैत देश की मुद्रा कुवैती दीनार के सबसे ताकतवर होने की एक खास वजह है। ये वजह है कुवैत में पाया जाने वाला तेल का भंडार। इस तेल को कुवैत पूरी दुनिया में निर्यात करता है। इस वजह से कुवैती दीनार की कीमत दुनिया में सबसे ज्यादा है।

साल 1960 में कुवैती सरकार ने पहली बार अपनी पहली कुवैती करंसी को दुनिया के सामने रखा था। उस समय इसकी कीमत भारतीय रुपये के हिसाब से 13 रुपये पर 1 कुवैती दीनार थी। साल 1970 में कुवैती दीनार का इंटरनेशनल मार्केट में एक्सचेंज रेट फिक्स कर दिया गया था। हालांकि कुवैती दीनार आज भी फिक्स्ड रेट पर है।

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आपको जानकर हैरानी होगी कि आज से 70-80 साल पहले कुवैत में जो करेंसी जारी होता था, उसे भारतीय सरकार ही जारी करती थी। यानि RBI एक समय में कुवैत की करेंसी बनाया करता था और उस करेंसी का नाम था गल्फ रुपि (Gulf Rupee)। यह बहुत हद तक भारतीय रूपया जैसा दिखने में था। इस गल्फ रूपी की खासियत यह थी की इसे भारत के अंदर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। हालांकि 1961 में कुवैत को ब्रिटिश सरकार से आजादी मिली थी, जिसके बाद 1963 में कुवैत पहली अरब कंट्री बन गई थी जहां पर सरकार का चुनाव हुआ था।

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