अंटार्कटिका में सूक्ष्मजीव ‘हवा से ऊर्जा’ लेकर सर्दियों में भी रहते हैं सक्रिय: अध्ययन

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अंटार्कटिका में सूक्ष्मजीव ‘हवा से ऊर्जा’ लेकर सर्दियों में भी रहते हैं सक्रिय: अध्ययन

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  • Publish Date - March 16, 2026 / 12:27 PM IST,
    Updated On - March 16, 2026 / 12:27 PM IST

( राय हॉलैंड, मोनाश यूनिवर्सिटी )

मेलबर्न, 16 मार्च (द कन्वरसेशन) अंटार्कटिका की लंबी और अंधेरी सर्दियों में तापमान शून्य से काफी नीचे चला जाता है और कई क्षेत्रों में अप्रैल से अगस्त तक सूरज नहीं निकलता, लेकिन तब भी वहां जीवन पूरी तरह नहीं रुकता।

एक नए अध्ययन में पाया गया है कि अंटार्कटिका के सूक्ष्मजीव हवा में मौजूद गैसों से ऊर्जा लेकर बेहद ठंडे मौसम में भी सक्रिय बने रहते हैं।

‘द आईएसएमई’ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बताया कि अंटार्कटिका के कुछ सूक्ष्मजीव शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस नीचे तक के तापमान में भी वातावरण से हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों का उपयोग कर ऊर्जा बना सकते हैं। यह खोज यह समझने में मदद करती है कि अत्यधिक ठंडे और कठोर वातावरण में जीवन कैसे जीवित रहता है और भविष्य में जलवायु परिवर्तन इस प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

सामान्यतः पृथ्वी के अधिकतर स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों में खाद्य श्रृंखला का आधार प्रकाश संश्लेषण होता है। पौधे सूर्य के प्रकाश और वातावरण से कार्बन लेकर ऊर्जा और जैविक पदार्थ का निर्माण करते हैं। लेकिन अंटार्कटिका की शुष्क और ठंडी मिट्टी में सूर्य का प्रकाश लंबे समय तक उपलब्ध नहीं होता और वहां प्रकाश संश्लेषण करने वाले जीव बहुत कम पाए जाते हैं। ऐसे में सूक्ष्मजीवों के लिए ऊर्जा प्राप्त करने का तरीका अलग होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार “एरोट्रॉफी” नामक प्रक्रिया अंटार्कटिका के सूक्ष्मजीवों को जीवित रहने में मदद करती है। इस प्रक्रिया में सूक्ष्मजीव विशेष एंजाइमों की मदद से वातावरण में बेहद कम मात्रा में मौजूद हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड को पहचानते हैं और उनसे ऊर्जा बनाते हैं। पोषक तत्वों की कमी वाले अंटार्कटिका के रेगिस्तानी इलाकों में यह क्षमता उनके लिए एक बड़ा लाभ है।

शोधकर्ताओं ने 2022 से 2024 के बीच पूर्वी अंटार्कटिका के अलग-अलग क्षेत्रों से सतह की मिट्टी के नमूने एकत्र किए और प्रयोगशाला में उनका विश्लेषण किया। उन्होंने यह मापा कि सूक्ष्मजीव वातावरणीय गैसों का कितनी तेजी से उपयोग करते हैं। इसके अलावा मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों का डीएनए निकालकर उसका अनुक्रमण किया गया, जिससे यह पता लगाया जा सके कि वहां कौन-कौन से सूक्ष्मजीव मौजूद हैं और वे ऊर्जा के लिए किन स्रोतों का उपयोग करते हैं।

प्रयोगों में पाया गया कि यह प्रक्रिया गर्मियों के औसत तापमान (लगभग 4 डिग्री सेल्सियस) और सर्दियों के तापमान (शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस नीचे) दोनों स्थितियों में सक्रिय रहती है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड पूरे वर्ष इन सूक्ष्मजीवों के लिए ऊर्जा का स्रोत बने रहते हैं।

अध्ययन में एक और रोचक तथ्य सामने आया कि ये सूक्ष्मजीव 75 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर भी हाइड्रोजन से ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं, जबकि अंटार्कटिका की मिट्टी का तापमान शायद ही कभी 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दर्शाता है कि ये सूक्ष्मजीव अत्यधिक ठंड के अनुरूप तो ढल चुके हैं, लेकिन केवल उसी तक सीमित नहीं हैं।

डीएनए विश्लेषण से यह भी पता चला कि अंटार्कटिका की मिट्टी में मौजूद अधिकतर सूक्ष्मजीवों में हाइड्रोजन से ऊर्जा प्राप्त करने वाले जीन मौजूद हैं और उनमें से कई वातावरण से कार्बन भी ग्रहण कर सकते हैं। इस कारण इन्हें “प्राथमिक उत्पादक” माना जाता है, क्योंकि वे हवा से ही नई जैविक सामग्री तैयार करते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अंटार्कटिका की कई जगहों पर एरोट्रॉफी ही खाद्य श्रृंखला का आधार बनती है। इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि यह वर्षभर हो सकती है और इसके लिए तरल पानी की आवश्यकता नहीं होती, जबकि प्रकाश संश्लेषण के लिए पानी जरूरी होता है।

अध्ययन में यह भी आकलन किया गया कि वैश्विक तापवृद्धि का इस प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? शोधकर्ताओं के अनुसार, कम उत्सर्जन वाले परिदृश्यों में सूक्ष्मजीवों द्वारा वातावरणीय हाइड्रोजन के उपयोग की दर लगभग चार प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जबकि अत्यधिक उत्सर्जन की स्थिति में यह वृद्धि 35 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

हालांकि हाइड्रोजन स्वयं ग्रीनहाउस गैस नहीं है, लेकिन यह वातावरण में मीथेन जैसी गैसों की अवधि को प्रभावित करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व भर में मिट्टी और उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर उपयोग होने वाली लगभग 82 प्रतिशत हाइड्रोजन को अवशोषित करते हैं, इसलिए वे वैश्विक हाइड्रोजन चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन अंटार्कटिका के विशिष्ट सूक्ष्मजीव पारिस्थितिक तंत्र को समझने और यह जानने में मदद करता है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच ये तंत्र कितने लचीले और टिकाऊ साबित हो सकते हैं।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा शोभना

शोभना