देवीघाट (नेपाल), 31 अगस्त (भाषा) बद्री प्रसाद देवकोटा अपनी पत्नी और 34 अन्य तीर्थयात्रियों के साथ बस में नेपाल के रसुवा जिले में स्थित हिंदू तीर्थस्थल गोसाईंकुंड जा रहे थे, तभी उन्होंने कीचड़ से भरा पानी बेहद तेज रफ्तार से बस की ओर आते हुए देखा।
देवकोटा ने ‘द काठमांडू पोस्ट’ को बताया, “मेरी पत्नी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘कूदना मत।’ मैंने उससे कहा, ‘हम यहां मर जाएंगे।’”
उन्होंने पत्नी से हाथ छुड़ाया और चलती बस से कूद गए। उस समय नुवाकोट के भैंसे इलाके में भोटेकोशी नदी की बाढ़ का पानी सड़क पर बह रहा था।
पानी की तेज लहर उन्हें सड़क किनारे बनी नाली में ले गई, लेकिन उन्होंने पहाड़ी पर मौजूद पेड़-पौधों को पकड़ लिया। वहां से उन्होंने देखा कि बस बाढ़ के पानी में पूरी तरह समा गई।
समाचार पत्र ने सोमवार को बताया कि दो शव बरामद किए जा चुके हैं और समूह के 28 लोग अब भी लापता हैं, जिनमें देवकोटा की पत्नी भी शामिल हैं।
छब्बीस अगस्त को आई बाढ़ के बाद बचे हुए लोगों के सामने अपनी जिंदगी दोबारा शुरू करने की चुनौती है, जबकि हजारों परिवार अब भी अपने लापता परिजनों की तलाश कर रहे हैं।
सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों लोगों के अब भी लापता होने के बीच जिंदा बचे लोगों की आपबीती से पता चलता है कि यह आपदा कितनी भयावह और व्यापक थी।
बाढ़ का पानी कम होने के बाद देवकोटा और बस से कूदकर बचने वाले छह यात्रियों में शामिल उनके चचेरे भाई तुलाराम पहाड़ी पर करीब 20 मीटर ऊपर चढ़े और दो घंटे तक घास के एक हिस्से पर बैठे रहे।
उन्होंने देखा कि कुछ लोग घरों की छतों पर फंसे हुए थे और कुछ लोग कीचड़ में दबे हुए थे। इसके बाद वे और ऊपर चढ़कर हिलेखरका नाम के एक गांव पहुंचे। वहां स्थानीय लोगों ने उन्हें चाय और बिस्कुट दिए और प्राथमिक उपचार दिलाने में मदद की।
अगले दिन दोनों अपने परिवारों की तलाश में भैंसे इलाके में वापस गए, लेकिन उन्हें परिवार के सदस्यों का कोई पता नहीं चला। इसके बाद वे अपने गृह जिले गोरखा लौट गए।
बेत्रावती इलाके में संतमण लामा नामक व्यक्ति ने एक चेतावनी पर ध्यान देकर अपनी जान बचाई, लेकिन उन्होंने अपना लगभग सब कुछ खो दिया।
लामा ने रविवार को ‘ऑनलाइनखबर’ न्यूज पोर्टल को बताया कि 26 अगस्त की सुबह वह अपने बेटे और बेटी को स्कूल छोड़कर घर लौट रहे थे, तभी पास की एक हार्डवेयर दुकान के मालिक ने उन्हें चेतावनी दी कि बाढ़ आने वाली है और वह पहाड़ी की ओर ऊपर चले जाएं।
बेत्रावती में बाढ़ की चेतावनी मिलना कोई असामान्य बात नहीं थी और लामा ने शुरुआत में इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन उन्होंने यह बात अपनी पत्नी को बता दी और परिवार ऊंची जगह पर चला गया।
इसके कुछ ही समय बाद बाढ़ की पहली तेज लहर आई। लामा ने बताया कि नदी उनकी पत्नी को बहाकर ले गई।
उन्होंने अपनी पत्नी को पकड़कर ऊंची जगह की ओर धकेला और खुद भी झाड़ियों को पकड़कर रुक गए। वहां से उन्होंने अपनी आंखों के सामने बाढ़ को अपना घर तबाह करते हुए देखा।
उन्होंने दो पड़ोसियों ईश्वरलाल श्रेष्ठ और बुद्धिलाल डंगोल को भी खींचकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, लेकिन बाद में उनका दोनों से संपर्क टूट गया।
बाद में लामा ने अपने बच्चों के स्कूल से संपर्क किया और उन्हें पता चला कि दोनों बच्चे सुरक्षित हैं।
लेकिन उनका घर, दुकान और उनकी लगभग सारी संपत्ति बाढ़ में बह गई।
लामा ने कहा, “मेरे पास खाने के लिए कुछ नहीं है और रहने के लिए भी कोई जगह नहीं है। मेरे पास जो कुछ था, वह सब चला गया।”
भाषा जोहेब दिलीप
दिलीप