(मार्टिन कीर, प्राध्यापक, सिडनी विश्वविद्यालय के सरकारी एवं अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग में प्राध्यापक )
सिडनी, 23 जून (द कन्वरसेशन) अमेरिका और ईरान के बीच हाल में हुए शांति समझौते ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया है। इस समझौते में न केवल दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त करने का प्रावधान शामिल है, बल्कि इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष विराम तथा लेबनान की क्षेत्रीय संप्रभुता और अखंडता के सम्मान की बात भी कही गई है।
इस घटनाक्रम ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक जटिल राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखना उनकी सरकार की मौजूदा सुरक्षा नीति के केंद्र में रहा है जबकि नया समझौता इसके विपरीत दिशा में संकेत करता है।
खबर के अनुसार, 19 जून को इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच एक और संघर्ष विराम पर सहमति बनी थी, लेकिन इसके अगले ही दिन इजराइल द्वारा लेबनान पर की गई बमबारी और उसके जवाब में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने से स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई।
इजराइल ने मार्च 2026 से हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियान तेज किया है और दक्षिण व पूर्वी लेबनान में कई क्षेत्रों पर नियंत्रण भी स्थापित किया है। इस दौरान इजराइली रक्षा बल (आईडीएफ) ने हिजबुल्लाह के पारंपरिक गढ़ों को ध्वस्त करते हुए दक्षिण बेरूत में भी हमले किए हैं। इस संघर्ष में अब तक 4,000 से अधिक लेबनानी नागरिकों की मौत और लगभग 10 लाख लोगों के विस्थापन की खबरें हैं।
आईडीएफ ने कई रणनीतिक इलाकों पर कब्जा करते हुए स्थानीय निवासियों को लौटने से रोकने के आदेश जारी किए हैं। साथ ही इजराइली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने कहा है कि सुरक्षा क्षेत्रों में इजराइली बल बिना किसी समय सीमा के तैनात रहेंगे और इन इलाकों को “आतंक ढांचे और स्थानीय आबादी से मुक्त” किया जाएगा।
इस सैन्य अभियान को इजराइल में व्यापक समर्थन प्राप्त है। एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत इजराइली नागरिक हिजबुल्लाह के खिलाफ युद्ध जारी रखने के पक्ष में हैं, भले ही इससे अमेरिका के साथ तनाव बढ़े।
आगामी चुनावों को देखते हुए यह समर्थन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अक्टूबर तक संभावित चुनावों से पहले नेतन्याहू पर यह दबाव है कि वे सुरक्षा और निर्णायक जीत का संदेश दें, ताकि घरेलू आलोचनाओं को कम किया जा सके। उन पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने 7 अक्टूबर के हमलों से पहले सुरक्षा चूक को गंभीरता से नहीं लिया।
नेतन्याहू ने हाल के वर्षों में हिजबुल्लाह, हमास और ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए यह दावा किया था कि वे पश्चिम एशिया के सुरक्षा परिदृश्य को बदल देंगे। हालांकि, इन संघर्षों के बावजूद इन समूहों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है, जिससे उनकी रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
इसी बीच अमेरिका की भूमिका भी निर्णायक बनती जा रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले पश्चिम एशिया में किसी लंबे युद्ध को समाप्त कर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। इसके लिए वे ईरान के साथ समझौते को आगे बढ़ा रहे हैं और इजराइल से संयम बरतने की अपेक्षा कर रहे हैं।
हाल ही में ट्रंप ने इजराइल की लेबनान नीति पर असंतोष जताते हुए कहा था कि लगातार चल रहे सैन्य अभियान से क्षेत्रीय शांति प्रयासों को नुकसान हो रहा है। इसके जवाब में इजराइल के कुछ नेताओं ने अमेरिका पर अधिक दबाव बनाने की आवश्यकता जताई, जबकि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजराइल को “वास्तविकता समझने” की सलाह दी।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजराइल के संबंध असमान हैं, जिसमें अमेरिका की आर्थिक और सैन्य सहायता इजराइल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत अमेरिका हर साल इजराइल को लगभग 3.8 अरब डॉलर की सहायता देता है, जिसमें मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए विशेष फंड भी शामिल है।
इसके अलावा, इजराइल को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में अपने खिलाफ संभावित कार्रवाई से बचाने के लिए अमेरिकी कूटनीतिक समर्थन पर भी निर्भर रहना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चल रही जांचों के चलते यह समर्थन और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
वर्तमान परिस्थितियों में लेबनान की स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है, इजराइल में चुनावी माहौल गर्म है और अमेरिका-ईरान वार्ता इजराइल के हितों से अलग दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू आगे किस रास्ते को चुनते हैं—अमेरिका के साथ तालमेल या अपनी सुरक्षा नीति पर अडिग रुख।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश