नए जीवाश्म से पृथ्वी पर जीवन के इतिहास के ‘फुरोंजियन गैप’ को समझने में मदद मिलेगी

नए जीवाश्म से पृथ्वी पर जीवन के इतिहास के ‘फुरोंजियन गैप’ को समझने में मदद मिलेगी

नए जीवाश्म से पृथ्वी पर जीवन के इतिहास के ‘फुरोंजियन गैप’ को समझने में मदद मिलेगी
Modified Date: May 29, 2026 / 03:50 pm IST
Published Date: May 29, 2026 3:50 pm IST

(रसेल डीन क्रिस्टोफर बिकनेल, फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय और जूलियन किम्मिग, नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम कार्लजूए)

एडिलेड, 29 मई (द कन्वरसेशन) करीब 50 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर जीवन के विकास के दौरान एक बेहद विचित्र घटना घटी प्रतीत होती है।

कैम्ब्रियन युग के जीवाश्म रिकॉर्ड में इतिहास का एक पूरा अध्याय ही गायब दिखाई देता है। जीवाश्म वैज्ञानिक इसे “फुरोंजियन गैप” कहते हैं। यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि इस अंतराल के ठीक पहले और बाद के जीवाश्म रिकॉर्ड में जैव-विविधता का असाधारण विस्तार देखने को मिलता है।

अब तक इसे एक वास्तविक जैविक संकट का प्रमाण माना जाता रहा है। अनुमान है कि इसके पीछे पर्यावरणीय अस्थिरता, समुद्र के रासायनिक स्वरूप में बदलाव, जलवायु का ठंडा होना, प्राचीन समुद्रों में ऑक्सीजन स्तर की कमी या इन सभी कारणों का मिला-जुला असर था।

लेकिन ‘बीएमसी बायोलॉजी’ पत्रिका में प्रकाशित हमारे नए अध्ययन से एक वैकल्पिक सोच के समर्थन में नए प्रमाण मिले हैं। संभव है कि ‘फुरोंजियन’ वास्तव में जैव-विविधता के पतन का दौर न रहा हो, बल्कि यह उन स्थानों और चट्टानों से जुड़ा अंतराल हो जहां वैज्ञानिकों ने अब तक पर्याप्त खोजबीन नहीं की।

यह हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी के इतिहास को लेकर हमारी समझ अभी भी कितनी अधूरी है।

जीवाश्मों का एक दुर्लभ समूह

हमने कनाडा के क्यूबेक से 50 करोड़ वर्ष पुराने एक नए ‘आर्थ्रोपोड’ का वर्णन किया है। आर्थ्रोपोड ऐसे जीव होते हैं जिनके शरीर के बाहर कठोर कंकाल यानी ‘एक्ज़ोस्केलेटन’ होता है, शरीर खंडों में बंटा होता है और अंग संधि वाले अर्थात जोड़ वाले होते हैं।

यह जीवाश्म शुरुआती ‘आर्थ्रोपोड्स’ के एक दुर्लभ समूह से संबंधित है। इसका संबंध उस वंश से माना जाता है जिससे आगे चलकर मकड़ियां और बिच्छू विकसित हुए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जीवाश्म ऐसे भूवैज्ञानिक परिवेश से मिला है जिसे अब तक वैज्ञानिक पृथ्वी के इतिहास के इस काल में जीवाश्म संरक्षण के लिए खास नहीं मानते थे।

इस जीवाश्म का नाम ‘मैग्निकॉर्नास्पिस गारवुडी’ रखा गया है। यह जीव ‘कोरकोरानिड्स’ नामक शुरुआती आर्थ्रोपोड्स के रहस्यमय समूह से जुड़ा था। इन जीवों के चौड़े सिर-कवच, भागों में बंटे शरीर और सुरक्षा के लिए कांटे होते थे।

दुनियाभर में ‘कोरकोरानिड्स’ के जीवाश्म बेहद दुर्लभ हैं। कैम्ब्रियन और ऑर्डोविशियन काल से अब तक इनकी केवल कुछ ही प्रजातियों का पता चला है।

हमारे नमूने की सबसे अनोखी विशेषता इसके सिर से आगे की ओर निकले दो बड़े कांटेनुमा अंग हैं। यही इसे पहले ज्ञात प्रजातियों से अलग बनाते हैं। इससे संकेत मिलता है कि इस समूह में सुरक्षा संबंधी जैविक अनुकूलन वैज्ञानिकों की पिछली समझ से कहीं पहले विकसित हो चुके थे।

दशकों तक संग्रहालय की दराज में पड़ा रहा जीवाश्म

यह नमूना मूलरूप से 1962 में क्यूबेक के सैंट-ऐन-दे-ला-पोकातिएर इलाके के पास भूवैज्ञानिक मानचित्रण के दौरान मिला था। यह ‘रिविएर-डु-लूप फॉर्मेशन’ की चट्टानों से मिला।

यह नमूना दशकों तक वाशिंगटन स्थित ‘स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री’ के संग्रह में लगभग अनदेखा पड़ा रहा।

यह जीवाश्म विज्ञान की इस अहम सच्चाई को भी उजागर करता है कि बड़ी खोजें हमेशा सीधे मैदान में उतरने से ही नहीं निकलतीं।

संग्रहालयों में पिछले सौ वर्षों के दौरान भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों और अभियानों से जुटाई गई बड़ी मात्रा में ऐसी सामग्री मौजूद है, जिस पर अभी तक पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ। आधुनिक तकनीकों के साथ इन संग्रहों की दोबारा जांच प्राचीन पारिस्थितिक तंत्रों को लेकर हमारी समझ को पूरी तरह बदल सकती है।

खोज की प्रतीक्षा में हैं और भी खजाने

हमारी यह खोज उन बढ़ते प्रमाणों में नया योगदान देती है जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि कैम्ब्रियन काल का अंतिम चरण जैविक रूप से लगभग वीरान दुनिया थी।

चीन और स्वीडन में हुए अध्ययनों में भी 49.7 करोड़ से 48.5 करोड़ वर्ष पुराने बेहतर तरीके से संरक्षित जीवाश्म मिले हैं।

इन सभी खोजों से संकेत मिलता है कि उस समय भी पारिस्थितिक तंत्र विविध और जटिल बने हुए थे।

क्यूबेक का यह नया जीवाश्म इस तस्वीर को भौगोलिक रूप से और विस्तृत करता है। हमारा नमूना यह प्रदर्शित करता है कि पूर्वी लॉरेन्शिया का प्राचीन एपलाचियन क्षेत्र जीवाश्म संरक्षण के लिए बेहद उपयुक्त स्थान था। पूर्वी लॉरेन्शिया प्राचीन महाद्वीप है जिसमें आज का अधिकांश उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड शामिल था।

इससे उस दौर में कोमल शरीर वाले जीवाश्मों के संरक्षण के ज्ञात विस्तार का दायरा और बढ़ता है। साथ ही यह संकेत भी मिलता है कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के भंडार खोजे जाने शेष हो सकते हैं।

इसलिए संभव है कि ‘फुरोंजियन गैप’ वास्तव में किसी जैविक पतन का संकेत न हो।

‘फुरोंजियन गैप’ के हर नए असाधारण जीवाश्म स्थल की खोज इस कथित अंतराल को और छोटा कर रही है। ये खोज दिखाती हैं कि कैम्ब्रियन काल के अंतिम दौर में भी अत्यंत विकसित और जटिल पारिस्थितिक तंत्र फल-फूल रहे थे।

हो सकता है कि अगली बड़ी जीवाश्मीय खोज किसी दूरदराज के रेगिस्तान में नयी चट्टानों के बीच न मिले। संभव है कि वह दशकों पहले एकत्र किया गया कोई नमूना हो, जो आज भी किसी संग्रहालय की अलमारी में रखा अपनी वास्तविक अहमियत पहचाने जाने का इंतजार कर रहा हो।

द कन्वरसेशन खारी मनीषा

मनीषा


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