लैम्पेडुसा (इटली), पांच जुलाई (एपी) आव्रजन के खिलाफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की कार्रवाई को लेकर मतभेद जता चुके पोप लियो चौदहवें ने स्वतंत्रता और समृद्धि की तलाश में यूरोप पहुंचने की कोशिश के दौरान मारे गए हजारों लोगों को लैम्पेडुसा द्वीप में शनिवार को श्रद्धांजलि दी।
अमेरिका में स्वतंत्रता की घोषणा की चार जुलाई को 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर रैलियां एवं समारोह आयोजित किए गए और आतिशबाजी की गई। इस बीच अमेरिका में जन्मे पोप इटली में सिसिली के लैम्पेडुसा द्वीप पहुंचे जहां उन्होंने प्रवासियों के कब्रिस्तान में प्रार्थना की और द्वीप के निवासियों एवं हाल में वहां पहुंचे लोगों के लिए विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की।
पोप बाद में वेटिकन में अमेरिका के राजदूत ब्रायन बर्च के आवास गए। वेटिकन ने पुष्टि की थी कि लियो ने वर्षगांठ समारोह में शामिल होने का बर्च का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है।
नौ किलोमीटर लंबा चट्टानी लैम्पेडुसा द्वीप इटली की मुख्य भूमि की तुलना में अफ्रीका के अधिक करीब है। यह लीबिया या ट्यूनीशिया से नावों के जरिए यूरोप पहुंचने वाले लाखों प्रवासियों के लिए प्रवेश द्वार है। इनमें से कई को मानव तस्कर अवैध रूप से यहां पहुंचाते हैं।
लियो ने बंदरगाह पर कुछ प्रवासियों से मुलाकात की और बाद में प्रार्थना सभा आयोजित की।
लियो ने अपने उपदेश में प्रवासियों का स्वागत करने और उनके प्रति ‘‘करुणा का चमत्कार’’ दिखाने के लिए लैम्पेडुसा के निवासियों को धन्यवाद दिया। उन्होंने यूरोप से मौजूदा चुनौती का सामना करने और अपनी जिम्मेदारी निभाने का आग्रह किया।
लियो ने कहा, ‘‘यह ऐसी जगह है, जहां काम शब्दों से अधिक प्रभावशाली होते हैं लेकिन किसी काम के मानवीय होने के लिए उसमें संवेदना होना जरूरी है।’’
इस विशेष शनिवार को लैम्पेडुसा का दौरा करके लियो ने अमेरिका और यूरोप को यह महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक संदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्ति, विशेष रूप से प्रवासियों और सबसे कमजोर लोगों की गरिमा की रक्षा करना ईसाइयों का दायित्व है।
उन्होंने अमेरिका को यह भी याद दिलाया कि इस देश की स्थापना प्रवासियों ने की थी।
लियो ने चार जुलाई के अवसर पर अमेरिकियों को भेजे पत्र में कहा कि अजन्मे शिशुओं और हर मानव जीवन की रक्षा करने का अर्थ प्रवासियों का स्वागत करना, उनकी सुरक्षा करना और उनकी सहायता करना भी है।
उन्होंने लिखा, ‘‘प्रवासियों की उम्मीदें, त्याग और योगदान शुरू से ही इस देश के इतिहास का हिस्सा रहे हैं। उनका करुणा और उदारता के साथ स्वागत करना केवल परोपकार का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करना भी है।’’
एपी सिम्मी रंजन
रंजन