लैटिन अमेरिकी देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी दखल का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना

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लैटिन अमेरिकी देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी दखल का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना

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  • Publish Date - July 14, 2026 / 05:08 PM IST,
    Updated On - July 14, 2026 / 05:08 PM IST

(लिंडसे शेकेनबैक रेगेले, मियामी विश्वविद्यालय)

ऑक्सफोर्ड (अमेरिका), 14 जुलाई (द कन्वरसेशन) अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देशों में अपना सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक हस्तक्षेप तेज कर दिया है।

इन तीनों पहलुओं की सबसे स्पष्ट झलक जनवरी 2026 में वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अमेरिकी अपहरण की घटना में देखने को मिली।

इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने ‘इनाम और दबाव’ की मिश्रित रणनीति अपनाकर मादुरो सरकार के बचे हुए ढांचे को अमेरिकी उद्देश्यों के समर्थन के लिए तैयार करने की कोशिश की। इन उद्देश्यों में वेनेजुएला के तेल उद्योग को विदेशी निवेश के लिए खोलना और देश में आपराधिक गतिविधियों के आरोपियों के खिलाफ लक्षित कार्रवाई शामिल है।

साथ ही अमेरिका को वेनेजुएला में विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो जैसे स्थानीय सहयोगी भी मिले हैं। मचाडो वर्ष 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता हैं और लंबे समय से मादुरो की प्रमुख आलोचक रही हैं।

प्रारंभिक अमेरिकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था, कूटनीति और युद्ध के इतिहास का अध्ययन करने वाले एक इतिहासकार के रूप में मेरा मानना है कि वेनेजुएला में जारी अमेरिकी हस्तक्षेप की गूंज 19वीं सदी की शुरुआत में हुई एक ऐतिहासिक घटना में भी सुनाई देती है।

वर्ष 1805 में दक्षिण अमेरिकी क्रांतिकारी फ्रांसिस्को डी मिरांडा अमेरिका पहुंचे थे। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन सहित कई प्रमुख अमेरिकी नेताओं से मुलाकात की थी।

आज की मचाडो की तरह मिरांडा का उद्देश्य भी अमेरिकी समर्थन हासिल करना था, ताकि वे अपने देश की अलोकप्रिय सरकार को सत्ता से हटाने के लिए प्रस्तावित अभियान को आगे बढ़ा सकें।

स्पेनिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष—

अमेरिका की स्थापना के शुरुआती दौर से ही उसके संस्थापक नेताओं की इच्छा थी कि देश अपनी मूल 13 कॉलोनियों से आगे विस्तार करे और अपने प्रभाव को बढ़ाए।

इस विस्तार की राह में एक ओर विशाल भूभागों पर बसे मूल अमेरिकी समुदाय थे, तो दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन जैसे यूरोपीय साम्राज्य, जिन्होंने आज के अमेरिका के बड़े हिस्सों पर दावा किया हुआ था।

यूरोप और अमेरिका में क्रांतियों तथा विस्तारवाद के इसी दौर में फ्रांसिस्को डी मिरांडा एक प्रमुख शख्सियत के रूप में उभरे।

उन्होंने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्पेन की उस सेना में ब्रिटेन के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जो अमेरिका की सहयोगी थी। बाद में वे फ्रांसीसी क्रांति के दौरान गणतांत्रिक बलों में शामिल हुए, हालांकि कट्टरपंथी जैकोबिनों ने उन्हें जेल में भी डाल दिया।

लेकिन उनका सबसे बड़ा लक्ष्य स्पेनिश साम्राज्य से दक्षिण अमेरिका, विशेषकर अपने जन्मस्थान वेनेजुएला को स्वतंत्र कराना था।

मिरांडा ने दो दशकों से अधिक समय तक अमेरिका में सहयोगियों की तलाश की। उनका उद्देश्य दक्षिण अमेरिका में गणतंत्र की स्थापना और काराकास सहित अन्य क्षेत्रों में स्पेनिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त करना था।

उन्होंने अमेरिकी प्रभावशाली नेताओं से इतने मजबूत संबंध बनाए कि अमेरिका के पहले वित्त मंत्री अलेक्जेंडर हैमिल्टन उनके प्रमुख समर्थकों में शामिल हो गए। वर्ष 1784 में हैमिल्टन ने मिरांडा को उन प्रभावशाली लोगों की सूची भेजी, जो दक्षिण अमेरिका में हस्तक्षेप के पक्षधर हो सकते थे।

इसके बाद 1798 में जब हैमिल्टन को अमेरिकी सेना का महानिरीक्षक नियुक्त किया गया, तब उन्होंने संकेत दिया कि हाल ही में विस्तारित अमेरिकी सेना स्पेन के नियंत्रण वाले क्षेत्रों पर कब्जा करने का माध्यम बन सकती है।

हालांकि उस समय यह योजना साकार नहीं हुई, लेकिन मिरांडा को यह विश्वास हो गया कि अमेरिकी नेतृत्व उनके विचारों के प्रति सहानुभूति रखता है। 19वीं सदी की शुरुआत तक स्पेन के अधीन वह क्षेत्र (जो आगे चलकर वेनेजुएला बना) औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आंदोलनों से प्रभावित होने लगा था।

रक्षा खर्च बढ़ने, किलों के निर्माण और स्थानीय मिलिशिया तैयार करने के कारण स्पेन ने कर बढ़ा दिए, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। इससे पहले 18वीं सदी के अंतिम दशकों में कई कर-विरोधी विद्रोह भी हो चुके थे।

स्पेन के व्यापारिक एकाधिकार तथा सरकारी पदों पर केवल स्पेन में जन्मे अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर भी व्यापक असंतोष था।

क्रांतिकारी योजना की शुरुआत—

अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अमेरिका में आम तौर पर दक्षिण अमेरिकी उपनिवेशों के लोगों के प्रति सहानुभूति थी, हालांकि वहां की राजनीतिक परिस्थितियों की समझ सीमित थी।

इसके साथ ही अमेरिकी निवेशक दक्षिण अमेरिका के चांदी के व्यापार तक पहुंच चाहते थे और वेनेजुएला की कॉफी, कोको तथा इंडिगो पर स्पेन के एकाधिकार का अंत भी चाहते थे। आज की तरह उस समय भी आर्थिक हित अमेरिकी रुचि का प्रमुख कारण थे।

इसी पृष्ठभूमि में 1805 की शरद ऋतु में मिरांडा न्यूयॉर्क पहुंचे। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम के लिए सहयोगी जुटाना था।

मिरांडा ने अपने पुराने मित्र विलियम स्मिथ से मुलाकात की, जो पूर्व राष्ट्रपति जॉन एडम्स के दामाद भी थे। न्यूयॉर्क बंदरगाह के सर्वेक्षक के रूप में कार्यरत स्मिथ ने उनकी मुलाकात धनी व्यापारी सैमुअल ओग्डेन से कराई, जो सशस्त्र जहाजों के साथ अक्सर हैती जाया करते थे।

स्मिथ और ओग्डेन ने सलाह दी कि मिरांडा पहले वाशिंगटन जाकर अमेरिकी सरकार का आधिकारिक समर्थन हासिल करें, उसके बाद वेनेजुएला की सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना पर आगे बढ़ें।

व्हाइट हाउस पहुंचने पर मिरांडा ने मंत्रिमंडल की बैठक में हिस्सा लिया और राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन के साथ रात्रिभोज भी किया। दोनों के बीच क्रांति पर चर्चा हुई। जेफरसन ने स्वतंत्रता के प्रति सहानुभूति जताई और कहा कि यह परिवर्तन जल्द ही होगा।

बाद में जेफरसन ने अमेरिका में स्पेन के राजदूत डॉन वेलेंटिन डी फोरोंडा को लिखा कि उनकी सरकार को इस बात का कोई संदेह नहीं था कि मिरांडा अमेरिका से लोगों की भर्ती करना चाहते हैं।

यह मानना हालांकि कठिन है कि जेफरसन को मिरांडा की वास्तविक योजना की भनक न लगी हो। राजधानी के राजनीतिक और कारोबारी हलकों में उनके अभियान की व्यापक रूप से चर्चा हो रही थी।

वाशिंगटन के व्यापारी और निवेशक विलियम मेन डंकैनसन ने तो स्वयं जेफरसन से इस अभियान में शामिल होने की इच्छा भी जताई थी, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि राष्ट्रपति मिरांडा की योजना के प्रति सहानुभूति रखते हैं।

फिर भी जेफरसन अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय कानून का भी ध्यान रखते थे। इसलिए उन्होंने कई वर्षों तक स्पेन को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि अमेरिकी सरकार इस अभियान के आयोजन में शामिल नहीं थी।

विदेश में विफलता, देश में राजनीतिक विवाद—

जनवरी 1806 की शुरुआत में मिरांडा आधिकारिक समर्थन के बिना न्यूयॉर्क लौट आए। फिर भी उन्हें विश्वास था कि जेफरसन प्रशासन का मौन समर्थन उन्हें प्राप्त है।

इसके बाद मिरांडा, स्मिथ और ओग्डेन ने ‘लीएंडर’ नामक एक व्यापारी जहाज को सैन्य सामग्री और लगभग 200 लोगों के साथ तैयार किया। इनमें से कई लोगों को अपने अभियान के वास्तविक उद्देश्य की पूरी जानकारी भी नहीं थी।

दो फरवरी 1806 को यह जहाज न्यूयॉर्क से रवाना हुआ और अमेरिकी समाचारपत्रों में इसके गंतव्य तथा अभियान को लेकर अटकलें शुरू हो गईं।

फिलाडेल्फिया गजट में 22 फरवरी को विदेश मंत्री जेम्स मैडिसन से जुड़े कई सवाल प्रकाशित हुए। ऐसा माना गया कि यह लेख स्पेन के राजदूत की ओर से भेजा गया था। इसमें जेफरसन और मैडिसन पर मिरांडा की गतिविधियों को मौन स्वीकृति देने का आरोप लगाया गया।

देश और विदेश दोनों जगह जवाबदेही से बचने के लिए जेफरसन ने ओग्डेन और स्मिथ के खिलाफ मुकदमा चलाने का निर्णय लिया। दोनों को गिरफ्तार किया गया और उसी वर्ष संघीय अदालत में मुकदमा चला, लेकिन सहानुभूतिपूर्ण जूरी ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।

उधर, मिरांडा के अभियान में शामिल कई लोगों को वेनेजुएला के तट के निकट स्पेनिश सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया। विद्रोह के आरोप में उन पर मुकदमा चला। अधिकांश को कारावास मिला, जबकि 10 लोगों को फांसी दे दी गई।

मिरांडा किसी तरह अरूबा भाग निकले। बाद में 1810 में शुरू हुए वेनेजुएला के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कुछ समय के लिए देश का नेतृत्व भी किया।

हालांकि बाद में उनके शिष्य और महान स्वतंत्रता सेनानी सिमोन बोलिवार ने उन पर स्पेन के साथ समझौता करने का आरोप लगाया और उन्हें स्पेनिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। मिरांडा की 1816 में स्पेन की एक जेल में मृत्यु हो गई।

अमेरिका में अभियान में शामिल कैदियों के साथ हुए व्यवहार ने व्यापक जनाक्रोश पैदा किया और राजनीतिक बहस छिड़ गई।

जेफरसन के विरोधियों ने उन पर विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने और कैदियों को बचाने में विफल रहने का आरोप लगाया, जबकि उनके समर्थकों ने प्रतिद्वंद्वी फेडरलिस्ट पार्टी पर स्पेन के उपनिवेशों में विद्रोह भड़काने की साजिश रचने का आरोप लगाया। मिरांडा का अभियान लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप को लेकर हुई शुरुआती बहसों में से एक था।

उस समय अमेरिका की सरकार ने आधिकारिक रूप से किसी सैन्य अभियान का समर्थन करने से इनकार किया था।

फिर भी इस घटना ने एक लंबी ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत की, जिसमें अनेक विदेशी नेताओं ने यह विश्वास किया कि अपने देशों में नयी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए अमेरिकी हस्तक्षेप एक प्रभावी साधन हो सकता है। उनके लिए लक्ष्य हमेशा एक ही रहा-अलोकप्रिय शासन से मुक्ति।

द कन्वरसेशन रवि कांत रवि कांत नरेश

नरेश