अस्वीकृति का दर्द गहरा होता है, बच्चों और किशोरों को इससे उबरना कैसे सिखाएं?

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अस्वीकृति का दर्द गहरा होता है, बच्चों और किशोरों को इससे उबरना कैसे सिखाएं?

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  • Publish Date - July 24, 2026 / 10:28 AM IST,
    Updated On - July 24, 2026 / 10:28 AM IST

(मेलानी जे. जिमर-गेमबेक, गिफिथ विश्वविद्यालय)

सिडनी, 24 जुलाई (द कन्वरसेशन) ‘रिजेक्शन’ यानी अस्वीकृति की पीड़ा कई बार इतनी गहरी होती है कि वह किसी शारीरिक चोट जैसी महसूस होने लगती है। ऐसा लगता है मानो किसी ने पेट में जोरदार मुक्का मार दिया हो या दिल सचमुच दर्द से भर उठा हो। यह एहसास केवल किसी अवसर के छूट जाने का नहीं होता, बल्कि इस बात का भी होता है कि शायद अब हमारी कोई अहमियत नहीं रही। ऐसे में व्यक्ति अपनी योग्यता पर भी सवाल उठाने लगता है।

स्कूल के दिनों में बच्चों के सामने नेतृत्व की भूमिकाएं निभाने और पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेने के अनेक अवसर आते हैं। कोई स्कूल नाटक में मुख्य भूमिका पाने की कोशिश करता है, कोई खेल टीम में जगह बनाने के लिए मेहनत करता है, तो कोई स्कूल बैंड में एकल प्रस्तुति का सपना देखता है। ये सभी अवसर बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन हर बार हर बच्चे का चयन संभव नहीं होता।

स्कूल के बाहर भी बच्चों और किशोरों को कई तरह की अस्वीकृतियों का सामना करना पड़ता है। कभी उन्हें किसी पार्टी का निमंत्रण नहीं मिलता, कभी अंशकालिक नौकरी हाथ से निकल जाती है और कभी मनचाहे विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिल पाता।

माता-पिता के लिए भी यह स्थिति कम तकलीफदेह नहीं होती। अपने बच्चे को निराश और टूटता हुआ देखना बेहद पीड़ादायक होता है। वे उसके दर्द को महसूस तो करते हैं, लेकिन अक्सर समझ नहीं पाते कि इस मुश्किल समय में उसकी मदद कैसे करें।

बच्चे अस्वीकृति का सामना कैसे करते हैं?

अस्वीकृति अक्सर व्यक्तिगत अनुभव होती है, लेकिन इसका असर केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह उसके दोस्तों, सामाजिक संबंधों, समूह में उसकी पहचान और उपलब्धियों पर भी प्रभाव डाल सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी किशोर का खेल टीम में चयन नहीं होता, तो वह उन दोस्तों के साथ समय बिताने के अवसर भी खो सकता है, जिनका चयन हो गया है।

जो बच्चे पहली बार अस्वीकृति का सामना करते हैं, उनके लिए अपनी नकारात्मक भावनाओं को पहचानना और उन्हें संभालना आसान नहीं होता। ऐसे में उनका गुस्सा, चिंता या बेचैनी कभी-कभी खुद उनके लिए भी नयी होती है और परिवार वालों के लिए भी।

अध्ययनों से पता चलता है कि किशोरावस्था में हार्मोन और मस्तिष्क में होने वाले बदलावों के कारण किशोर अस्वीकृति के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इस उम्र में उनका ध्यान परिवार से आगे बढ़कर दोस्तों और सामाजिक संबंधों की ओर अधिक केंद्रित होने लगता है। ऐसे में अस्वीकृति उन्हें सामान्य से कहीं अधिक गहराई से प्रभावित करती है।

सोशल मीडिया भी इस भावना को और बढ़ा सकता है। जब बच्चे और किशोर लगातार दूसरों की ‘‘आदर्श’’ जिंदगी और ‘‘शानदार’’ उपलब्धियों की तस्वीरें देखते हैं, तो उन्हें अपनी असफलताएं और भी बड़ी लगने लगती हैं।

यह संवेदनशीलता केवल किशोरावस्था तक सीमित नहीं रहती। बीस वर्ष की उम्र के बाद भी युवा स्वीकार किए जाने या ठुकराए जाने के संकेतों के प्रति बेहद सजग रहते हैं। यही कारण है कि अस्वीकृति उन्हें गहरी भावनात्मक पीड़ा दे सकता है।

हर असफलता नयी शुरुआत भी हो सकती है :

हालांकि, ठुकराए जाने का मतलब केवल निराशा नहीं है। यह जीवन का ऐसा अनुभव भी है, जो स्वीकार करना, स्वयं के प्रति दयालु होना, नए लक्ष्य तय करना और परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना जैसा महत्वपूर्ण जीवन-कौशल सिखाता है। यही कौशल आगे चलकर व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं और तनाव का सामना करने की क्षमता विकसित करते हैं।

माता-पिता और दूसरे बड़े लोग बच्चों को ये कौशल विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सही मार्गदर्शन मिलने पर बच्चे अस्वीकृति से उबरना सीख सकते हैं और पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

उनकी भावनाओं को समझें और स्वीकार करें :

छोटे बच्चों को, जिन्हें अभी अस्वीकृति का अधिक अनुभव नहीं है, सबसे पहले अपनी भावनाओं को शांत करने के लिए समय चाहिए होता है।

कुछ बच्चे अकेले रहना चाहते हैं और यह बिल्कुल स्वाभाविक है लेकिन बाद में उनसे बातचीत करना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें खुलकर अपनी बात कहने का अवसर देना बेहद जरूरी है।

किशोरों और युवाओं ने यदि पहले भी अस्वीकृति का सामना किया है, तो संभव है कि उन्होंने उससे निपटने के कुछ सकारात्मक तरीके विकसित कर लिए हों। वे यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि इस अनुभव से उन्हें क्या सीख मिली या फिर खुद को व्यस्त रखकर नकारात्मक विचारों से बाहर निकलने का प्रयास कर सकते हैं।

फिर भी, किसी भी सलाह या समाधान से पहले उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें स्वीकार करना सबसे अधिक जरूरी होता है।

माता-पिता बच्चों को अस्वीकृति को नए नजरिए से देखने में भी मदद कर सकते हैं। वे अपने जीवन की ऐसी घटनाएं साझा कर सकते हैं, जब उन्हें भी असफलता या अस्वीकृति मिली हो। इसके अलावा किसी प्रसिद्ध व्यक्ति, प्रेरक पुस्तक या बच्चे की पसंदीदा फिल्म की कहानी भी उदाहरण बन सकती है। ऐसी कहानियां बच्चों को यह एहसास दिलाती हैं कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि आगे बढ़ने की शुरुआत भी हो सकती है।

जब अस्वीकृत किया जाता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है- ‘ऐसा क्यों हुआ?’

कई बार माता-पिता भी कारण तलाशने लगते हैं- क्या शिक्षक ने पक्षपात किया? क्या बच्चे ने पर्याप्त मेहनत नहीं की? धीरे-धीरे यह सोच खुद को दोष देने की आदत में बदल सकती है, जिससे उदासी, गुस्सा, निराशा और आत्मसम्मान में कमी आने लगती है।

बेहतर होगा कि दोष तलाशने के बजाय बच्चे का ध्यान भविष्य की ओर मोड़ा जाए। उससे बात करें कि आगे कौन-से अवसर उसका इंतजार कर रहे हैं, वह कौन-से नए लक्ष्य बना सकता है और इस अनुभव से उसने क्या सीखा।

रिश्तों से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करें :

निराशा के बाद कुछ समय के लिए अकेले रहने का मन करना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी जरूरी है कि बच्चा परिवार और दोस्तों से पूरी तरह दूर न हो जाए। उसे अपनों के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करें। अपने लोगों का साथ आत्मविश्वास लौटाने के साथ-साथ यह एहसास भी दिलाता है कि वह अकेला नहीं है।

यह भी याद रखें कि अस्वीकृति का दर्द कई बार सचमुच किसी शारीरिक चोट जैसा महसूस होता है। यदि आप बच्चे को यह बात समझाएंगे, तो वह अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ पाएगा। जैसे किसी शारीरिक घाव को भरने में समय लगता है, वैसे ही भावनात्मक चोट को भी भरने के लिए समय चाहिए।

लेकिन यदि परिवार और अपने लोगों का साथ मिले, तो आज की यह निराशा जीवनभर का बोझ नहीं बनती। यही अनुभव बच्चों को मजबूत बनाता है, उन्हें भरोसेमंद रिश्तों का महत्व सिखाता है और जीवन की अगली चुनौती का सामना करने के लिए पहले से अधिक तैयार करता है।

द कन्वरसेशन गोला सिम्मी

सिम्मी