संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों का पश्चिमी देशों से अफगानिस्तान के साथ संवाद बढ़ाने का आग्रह
संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों का पश्चिमी देशों से अफगानिस्तान के साथ संवाद बढ़ाने का आग्रह
एथेंस, आठ जुलाई (एपी) संयुक्त राष्ट्र के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि पश्चिमी देशों के लिए अफगानिस्तान के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण है ताकि वह फिर से अस्थिरता की ओर न बढ़े, जिसके प्रभाव उसकी सीमाओं से कहीं आगे तक पड़ सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त बरहम सालेह ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के प्रमुख अलेक्जेंडर डी क्रू के साथ अफगानिस्तान की संयुक्त यात्रा के दौरान मंगलवार को ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘हाल के अतीत से यह सबक मिलता है कि अफगानिस्तान की अनदेखी करना उचित नहीं है।’’
सालेह ने वीडियो लिंक के जरिए कहा, ‘‘हालांकि अनेक चुनौतियां और कठिनाइयां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन अफगानिस्तान के साथ जुड़ना, उसे सहयोग देना और ऐसी नीतियों को बढ़ावा देना अधिक समझदारी होगी जो यह सुनिश्चित करें कि वह सुरक्षित और स्थिर बना रहे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यदि ऐसा नहीं किया गया तो अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है, जिसके परिणामस्वरूप मादक पदार्थों की तस्करी, उग्रवाद, आपराधिक गतिविधियों और शरणार्थियों के पलायन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।’’
चार दशक के संघर्ष के बाद अभावग्रस्त और विदेशी सहायता पर निर्भर अफगानिस्तान इस समय कई संकटों का सामना कर रहा है। इनमें प्राकृतिक आपदाएं, जलवायु परिवर्तन और हाल के दशकों में दुनिया में लौटने वाले शरणार्थियों की सबसे बड़ी लहर शामिल है।
डी क्रू ने कहा, ‘‘अफगानिस्तान में कभी एक अकेला संकट नहीं होता। यहां हमेशा एक संकट के ऊपर दूसरा संकट खड़ा होता है और यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।’’
संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों के अनुसार, वर्ष 2023 से अब तक लगभग 60 लाख लोग अफगानिस्तान लौट चुके हैं। इनमें अधिकतर पड़ोसी देशों पाकिस्तान और ईरान से आए हैं, जहां प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई थी। इस वर्ष भी लगभग 20 लाख लोगों के लौटने की संभावना है।
लौटने वाले लोगों के कारण स्थानीय समुदायों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। ऐसे समय में जब देश में व्यापक गरीबी है और सबसे कमजोर वर्ग कुपोषण से जूझ रहा है तथा स्थानीय संसाधन पहले से ही सीमित हैं।
स्थिति अंतरराष्ट्रीय सहायता में भारी कटौती और तालिबान सरकार की उन नीतियों से और गंभीर हुई है, जिनके तहत महिलाओं और लड़कियों को प्राथमिक स्तर से आगे की शिक्षा से वंचित रखा गया है तथा अधिकतर नौकरियों में उनके काम करने पर रोक है।
अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग-थलग पड़ा है। अगस्त 2021 में अमेरिका के नेतृत्व वाले सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान के सत्ता में आने के पश्चात किसी भी पश्चिमी देश ने उसकी सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। वर्ष 2025 में रूस ऐसा करने वाला पहला देश बना।
पिछले महीने तालिबान सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल कूटनीतिक सेवाओं और यूरोपीय देशों से अफगान नागरिकों की वापसी से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के लिए ब्रसेल्स गया था। इसे अफगानिस्तान के कूटनीतिक अलगाव में मामूली नरमी के संकेत के रूप में देखा गया।
संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों ने कहा कि गंभीर चुनौतियों के बावजूद अफगानिस्तान ने सुरक्षा, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और मादक पदार्थों के उत्पादन पर रोक जैसे कुछ क्षेत्रों में प्रगति की है।
डी क्रू ने कहा, ‘‘मैं इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करूंगा कि वहां प्रगति हुई है और संभवतः ऐसी प्रगति हुई है जिसकी पांच वर्ष पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।’’
उन्होंने कहा कि जिस देश को कभी अफीम और हेरोइन के प्रमुख उत्पादकों में गिना जाता था, वहां मादक पदार्थों के उत्पादन में 95 प्रतिशत की कमी आई है।
डी क्रू ने कहा, ‘‘यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब अफगानिस्तान से मुंह मोड़ लेता है तो इसके परिणाम केवल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसके प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पश्चिमी देशों के लिए संदेश यह है कि यदि वे एक स्थिर और शांतिपूर्ण समाज चाहते हैं तो यह केवल घरेलू नीतियों से संभव नहीं है। यदि आप शांति और स्थिरता में रहना चाहते हैं तो आपके पड़ोस में भी शांति और स्थिरता होना आवश्यक है।’’
एपी मनीषा वैभव
वैभव

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