( फराह एन जेन, पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी )
हैरिसबर्ग (अमेरिका), 30 जनवरी (द कन्वरसेशन) अमेरिका ईरान पर सैन्य हमले की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है। अगर ऐसा हुआ तो न केवल पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ने का खतरा है, बल्कि इससे वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों के प्रसार की एक नयी प्रतिक्रिया भी शुरू हो सकती है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 28 जनवरी 2026 को इस्लामिक गणराज्य के खिलाफ अपनी चेतावनियों को और कड़ा करते हुए कहा कि यदि तेहरान अमेरिकी मांगों से सहमत नहीं होता है तो उस पर “तेजी से’’ हमला किया जा सकता है। इस धमकी को बल देने के लिए पेंटागन ने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को विध्वंसक पोतों, बमवर्षकों और लड़ाकू विमानों के साथ ईरान के निकट तैनात कर दिया है।
अमेरिका की प्रमुख मांगों में ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को स्थायी रूप से समाप्त करना, बैलिस्टिक मिसाइल विकास पर रोक और हमास, हिज़्बुल्लाह तथा हूती जैसे चरमपंथी संगठनों को समर्थन बंद करना शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर अर्थव्यवस्था और हालिया विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहे ईरान पर दबाव बनाने का यह प्रयास गंभीर और दूरगामी परिणाम ला सकता है। ईरान के पास परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता है, लेकिन उसने अभी तक अंतिम कदम नहीं उठाया है। ऐसे देश पर हमला होने से यह संदेश जाता है कि संयम और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन भी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।
इस्लामिक गणराज्य ईरान की संस्थाएं 47 वर्षों के शासन के बाद समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी 28 जनवरी को माना कि यदि सरकार गिरती है तो आगे क्या होगा, इसका “कोई सरल उत्तर नहीं” है।
ईरान कोई कमजोर या आसानी से ढहने वाला देश नहीं है। 9.3 करोड़ की आबादी, मजबूत सुरक्षा तंत्र और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स जैसी संस्थाओं के कारण सत्ता परिवर्तन की स्थिति भी भारी अनिश्चितता पैदा कर सकती है। इससे परमाणु सामग्री और विशेषज्ञों पर नियंत्रण कमजोर होने, तकनीक के प्रसार और हथियार कार्यक्रम को तेज करने का जोखिम बढ़ सकता है।
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है। लीबिया ने 2003 में अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ा, लेकिन बाद में सैन्य हस्तक्षेप का सामना किया। यूक्रेन ने 1994 में परमाणु हथियार त्यागे, फिर भी उसे क्षेत्रीय आक्रमण झेलना पड़ा। जून 2025 में ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हुए हमलों ने यह धारणा और मजबूत की कि केवल सीमांत स्थिति में रहना पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता।
सैन्य कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। निरीक्षण और निगरानी व्यवस्था बाधित होती है और यह संदेश जाता है कि नियमों का पालन करने पर भी देश सुरक्षित नहीं हैं।
इसका प्रभाव क्षेत्रीय और वैश्विक हो सकता है। सऊदी अरब पहले ही कह चुका है कि यदि ईरान परमाणु हथियार बनाता है तो वह भी ऐसा करेगा। तुर्किये ने भी स्वतंत्र परमाणु क्षमता में रुचि जताई है। एशिया में जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिकी सुरक्षा आश्वासनों पर पुनर्विचार कर सकते हैं।
विश्लेषकों की मानें तो ईरान पर अमेरिकी हमले से क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव बढ़ने के बजाय घट सकता है और सबसे बड़ा खतरा यह है कि दुनिया के कई देश यह मान सकते हैं कि वास्तविक सुरक्षा केवल परमाणु हथियारों के स्वामित्व से ही संभव है।
(द कन्वरसेशन ) मनीषा अविनाश
अविनाश