(डेविड बी रॉबर्ट्स, किंग्स कॉलेज)
लंदन, दो मई (द कन्वरसेशन) ईरान युद्ध को शुरू हुए दो माह बीतने के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य अब भी लगभग पूरी तरह बंद पड़ा है। यहां से गुजरने वाले जहाजों की संख्या युद्ध-पूर्व की स्थिति के मुकाबले बेहद कम रह गई है। यही नहीं, 28 फरवरी से अब तक संघर्षविराम, नाकेबंदी और इसके पुन: बंद होने का जो दौर चला, उनसे टैंकर संचालकों का भरोसा बहाल नहीं हो सका है।
होर्मुज को लंबे समय से दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक गलियारों में से एक माना जाता रहा है। सामान्य दिनों में इस जलमार्ग से रोजाना करीब दो करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद के साथ-साथ दुनिया के कुल तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत का परिवहन होता है। इतना ही नहीं, दुनिया के एक तिहाई हीलियम और उतनी ही मात्रा में खाद के रूप में इस्तेमाल होने वाले यूरिया का परिवहन भी इसी जलडमरूमध्य से होता है।
होर्मुज का विकल्प तलाशने की कोशिशें दशकों से चल रही हैं, लेकिन अब तक ये सब कागजी योजनाएं ही थीं। पहली बार इनकी असली अग्निपरीक्षा हो रही है। नतीजा यह है कि वैकल्पिक रास्तों से उम्मीद के अनुसार करीब 35 से 55 लाख बैरल कच्चे तेल का परिवहन हो रहा है, लेकिन यह अब भी जरूरत से काफी कम है।
होर्मुज के विकल्प
दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण पाइपलाइन सऊदी अरब से होकर गुजरती है। पेट्रोलाइन कहे जाने वाली ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ का निर्माण 1980 के दशक में पहले टैंकर युद्ध के दौरान हुआ था, जब ईरान और इराक ने अपने आपसी संघर्ष के दौरान खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर हमले किए थे।
इस पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाकर 2019 में आपातकालीन स्तर पर 70 लाख बैरल प्रतिदिन कर दी गई, लेकिन लाल सागर के किनारे बसे यनबू के लोडिंग टर्मिनल जहाजों पर इस रफ्तार से इतने तेल की ढुलाई के लिए कभी तैयार ही नहीं किए गए थे। यही वजह है कि टैंकर यातायात पर नजर रखने वाले विश्लेषक बताते हैं कि पाइपलाइन अपनी पूरी क्षमता से अब भी कोसों दूर है।
यनबू से यूरोप जाने वाले तेल को अब भी मिस्र में सुमेड पाइपलाइन के जरिये गुजरना पड़ता है, जिसकी क्षमता महज 25 लाख बैरल प्रतिदिन है। युद्ध शुरू होने के बाद से इस पाइपलाइन में तेल प्रवाह 150 प्रतिशत बढ़ गया है, लेकिन इसकी सीमित क्षमता यूरोप की आपूर्ति के रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई है।
ईरान ने पेट्रोलाइन के भू-आर्थिक महत्व को भांपते हुए उसे निशाना बनाया। अप्रैल में एक ईरानी ड्रोन हमले ने एक पंपिंग स्टेशन को तबाह कर दिया, जिससे सात लाख बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति ठप हो गई।
संचालक ‘कंपनी सऊदी अरामको’ ने तीन दिन के भीतर पाइपलाइन को पूरी क्षमता पर बहाल कर लिया। मरम्मत की यह तेजी भले ही राहत देने वाली हो, लेकिन हमले का तथ्य चिंताजनक जरूर है।
खाड़ी के विकल्प के रूप में विकसित व्यवस्थाओं का दूसरा अहम हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात से होकर गुजरता है। ‘अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन’ (एडकॉप) हबशान से ओमान की खाड़ी वाले तट पर स्थित फुजैरा तक जाती है। लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाली ‘एडकॉप’ एकमात्र बड़ी वैकल्पिक पाइपलाइन है, जो खाड़ी से सीधे हिंद महासागर में निकलती है।
लेकिन पेट्रोलाइन की तरह यह भी हमलों की जद में आ चुकी है। मार्च में तीन, 14 और 16 तारीख को फुजैरा पर ईरानी ड्रोन हमलों के कारण भंडारण टैंकों में आग लग गई और लदान का काम ठप हो गया। ‘एडकॉप’ अमीरात को कुछ विकल्प जरूर देती है, लेकिन हमलों का खतरा इससे दूर नहीं होता।
खाड़ी के अन्य बड़े तेल उत्पादकों की हालत और भी नाजुक है। इराक का युद्ध-पूर्व कच्चे तेल का निर्यात 34 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो लगभग पूरी तरह दक्षिणी बंदरगाह शहर बसरा और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होता था।
एक उत्तरी पाइपलाइन जरूर है, जो किरकुक के तेल क्षेत्रों को तुर्किये के सेहान से जोड़ती है। यह पाइपलाइन ढाई साल तक बंद रहने के बाद सितंबर 2025 में फिर खुली और मार्च में इससे 2.5 लाख बैरल प्रतिदिन का प्रवाह शुरू हुआ, लेकिन इराक को जो नुकसान हुआ है, उसकी तुलना में यह आंकड़ा नगण्य है।
कुवैत की स्थिति और भी बदतर है। युद्ध से पहले उसका कच्चे तेल का निर्यात करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन था और हर निर्यात का परिवहन होर्मुज से जाता था। कुवैत के पास कोई वैकल्पिक पाइपलाइन नहीं है। कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने मार्च में ‘फोर्स मेजर’ घोषित कर दिया, यानी आपूर्ति अनुबंधों को अस्थायी रूप से निलंबित करने की कानूनी छूट ले ली और 20 अप्रैल को इसे फिर बढ़ाया गया।
कंपनी का कहना है कि होर्मुज खुल भी जाए, तो भी वह अपने अनुबंध की शर्तें पूरी नहीं कर सकती। कुवैत के उत्पादन तंत्र को हुए नुकसान की भरपाई और फिर उत्पादन बढ़ाने में महीनों लग जाएंगे।
कतर की कमजोरी एक अलग किस्म की है। उसका युद्ध-पूर्व कच्चे तेल का निर्यात पड़ोसियों के मुकाबले कम यानी करीब छह लाख बैरल प्रतिदिन था और इसका परिवहन होर्मुज से ही होता था। लेकिन कतर के लिए असली मायने गैस के हैं। रास लफ्फान में उसकी 7.7 करोड़ टन एलएनजी उत्पादन क्षमता दुनिया में सबसे बड़ी है, जो वैश्विक एलएनजी व्यापार का करीब 19 प्रतिशत हिस्सा है। इस गैस को होर्मुज के अलावा किसी और रास्ते से नहीं भेजा जा सकता।
ईरान ने खुद भी होर्मुज का एक विकल्प बनाया है- खाड़ी के सिरे पर स्थित गोरेह से ओमान की खाड़ी पर जास्क बंदरगाह तक एक हजार किलोमीटर लंबी पाइपलाइन। इसकी डिजाइन क्षमता 10 लाख बैरल प्रतिदिन है, लेकिन प्रतिबंधों और अधूरे टर्मिनल के कारण वास्तविक प्रवाह इसकी क्षमता के मुकाबले नगण्य रहा है।
द कन्वरसेशन
खारी सुरेश
सुरेश