श्वेत विशेषाधिकार: यह क्या है, इसका क्या अर्थ है और इसे समझना क्यों मायने रखता है..

श्वेत विशेषाधिकार: यह क्या है, इसका क्या अर्थ है और इसे समझना क्यों मायने रखता है..

Edited By: , September 14, 2021 / 03:06 PM IST

स्टेलनबोश विश्वविद्यालय के शिक्षा दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर नूरन डेविड्स, चैपल हिल में उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर, कैरोलिन टायसन, वर्जीनिया विश्वविद्यालय के मीडिया स्टडीज के सहायक प्रोफेसर केविन ड्रिस्कॉल, साइंस पो बोर्डो के अनुसंधान वैज्ञानिक एसोसिएट प्रोफेसर मगाली डेला सुड्डा, यूसीएलए लुस्किन स्कूल ऑफ पब्लिक अफेयर्स की एसोसिएट प्रोफेसर वेरोनिका टेरिकेज़ और कॉर्नेल विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर विवियन ज़ायस

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स्टेलनबोश (दक्षिण अफ्रीका), 14 सितंबर (द कन्वरसेशन) दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया का एक प्रतिष्ठित, निजी स्कूल हाल ही में विरोध प्रदर्शन का एक स्थल बन गया। काले शिक्षार्थियों और अभिभावकों ने आरोप लगाया है कि कॉर्नवाल हिल कॉलेज ने बोर्ड में केवल श्वेत लोगों की बजाय विविध शिक्षार्थी निकाय के प्रतिनिधि शामिल करने की उनकी मांग को अस्वीकार कर दिया है।

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इसके प्रदर्शन के जवाब में, दक्षिण अफ्रीका के एक युवा दक्षिणपंथी समूह ‘बिटरेइंडर्स’ (द बिटर एंडर्स) ने परिवर्तनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। समूह के एक सदस्य ने कहा कि ‘‘नाखुश हैं? तो अपना खुद का स्कूल बनाएं।’’

नस्ली असमानता परिवर्तन के इतनी खिलाफ क्यों है? कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा श्वेत विशेषाधिकार को स्वीकार करने और उससे निपटने में विफलता के कारण है।

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इतिहास:

‘‘श्वेत विशेषाधिकार’’ शब्द की उत्पत्ति 1980 के दशक में अमेरिका में हुई थी, जिसमें नस्ली अन्याय के प्रणालीगत रूपों द्वारा श्वेत लोगों को स्पष्ट और अस्पष्ट रूप से मिलने वाले सभी लाभों को उल्लेख किया गया था। ‘‘ नस्ली अन्याय ’’ और ‘‘ प्रणालीगत नस्ली पूर्वग्रह’’ जैसे शब्दों के विपरीत, विशेषाधिकार का विचार कुछ व्यक्तियों पर केन्द्रित है। वर्ष 2000 के दशक के मध्य तक, अमेरिका में कई शिक्षकों और कार्यकर्ताओं द्वारा श्वेत विशेषाधिकार शब्द को अपनाया गया था। वे उन असंख्य तरीकों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाह रहे थे जिनमें श्वेत लोग, चाहे वे किसी भी वर्ग से नाता रखते हो, उन्हें श्वेत वर्चस्व का फायदा मिलता है।

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दक्षिण अफ्रीका में, श्वेत विशेषाधिकार रंगभेद की विरासत है, जिसने सभी ऐसे लोगों को अपने अधीन किया, जिनकी त्वचा का रंग सफेद नहीं था। रंगभेद के राजनीतिक खात्मे के बावजूद, श्वेत विशेषाधिकार कायम हैं। नस्ली संगठनों के परिवर्तन के आह्वान को श्वेत लोगों द्वारा खतरे के रूप में देखा जाता है।

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वहीं फ्रांस में, श्वेत विशेषाधिकार शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत हाल ही में शुरू हुआ है, जिसे 2000 के दशक के अंत में सामाजिक वैज्ञानिकों द्वारा पेश किया गया था। गुलामी और औपनिवेशिक राजनीति की विरासतों के वर्णन की अवधारणा विशेष रूप से सटीक है और यह संरचनात्मक नस्लवाद के अनुभव को दिखाती है, जिसे फ्रांस के कई निवासियों ने साझा किया है।