होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते विवाद के बीच क्या ईरान परमाणु हथियार बनाएगा?

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होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते विवाद के बीच क्या ईरान परमाणु हथियार बनाएगा?

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  • Publish Date - August 4, 2026 / 01:07 PM IST,
    Updated On - August 4, 2026 / 01:07 PM IST

( एंड्र्यू थॉमस, दाइकिन विश्वविद्यालय )

सिडनी, चार अगस्त (द कन्वरसेशन) अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध लंबा खिंचने के साथ एक अहम सवाल पीछे छूटता नजर आ रहा है—क्या ईरान परमाणु हथियार बनाना चाहता है और यदि हां, तो क्या वह अब भी ऐसा करने में सक्षम है?

दोनों देशों के बीच अब होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे बड़ा विवाद का विषय बन गया है। ऐसे में यह हैरानी की बात है कि परमाणु कार्यक्रम पर पहले जैसी चर्चा नहीं हो रही। वर्ष 2025 और 2026 में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के प्रमुख कारणों में से एक यह आशंका भी थी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है।

ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इससे युद्ध समाप्त होने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर दबाव बनाने का उसे एक नया साधन मिल गया है। हालांकि, परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर उसकी वास्तविक मंशा पहले की तुलना में और अधिक अस्पष्ट हो गई है।

—– क्या ईरान अब भी परमाणु हथियार बना सकता है?—–

माना जाता है कि ईरान के पास लगभग 440 किलोग्राम 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम मौजूद है, जो सैद्धांतिक रूप से लगभग 10 परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

सामान्य परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए केवल तीन से पांच प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम की आवश्यकता होती है, जबकि अनुसंधान कार्यों में अधिकतम 20 प्रतिशत तक संवर्धन पर्याप्त माना जाता है।

ऐसे में 60 प्रतिशत तक संवर्धन चिंता का विषय माना जाता है क्योंकि विशेषज्ञों के अनुसार, परमाणु हथियार विकसित करने की संभावना के अलावा इसका कोई और व्यावहारिक उद्देश्य नहीं दिखता। इससे संकेत मिलता है कि ईरान भविष्य के लिए अपने विकल्प खुले रखना चाहता है।

हालांकि, परमाणु हथियार बनाने के लिए केवल संवर्धित यूरेनियम ही पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए विशेष उपकरण, सामग्री और तकनीकी ढांचे की भी आवश्यकता होती है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों से उसकी तकनीकी क्षमता को कुछ नुकसान पहुंचा हो सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक ज्ञान और विशेषज्ञता को बमबारी से समाप्त नहीं किया जा सकता।

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई अपने पिता की तुलना में परमाणु हथियार हासिल करने के प्रति अधिक इच्छुक हैं।

इस कारण, जब तक अमेरिका और इज़राइल जमीनी सैन्य कार्रवाई, सत्ता परिवर्तन या लंबे समय तक कब्जे जैसी कार्रवाई नहीं करते, तब तक ईरान के पास भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने का विकल्प बना रहेगा।

—– क्या ईरान वास्तव में ऐसा करना चाहेगा? —–

परमाणु प्रतिरोध सिद्धांत के अनुसार देश मुख्य रूप से अपने विरोधियों को सैन्य या परमाणु हमले से रोकने के लिए परमाणु हथियार विकसित करते हैं। इन हथियारों का उद्देश्य उनका उपयोग करना नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व भर से संभावित हमलावर को हमले से रोकना होता है।

उदाहरण के तौर पर, उत्तर कोरिया के पास परमाणु क्षमता होने के कारण अमेरिका उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने से बचता है, क्योंकि उत्तर कोरिया जापान, दक्षिण कोरिया या अमेरिका के गुआम क्षेत्र पर हमला करने की क्षमता रखता है।

इसी प्रकार यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो क्षेत्रीय देशों के लिए उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करना कहीं अधिक कठिन हो जाएगा। साथ ही, उसे इज़राइल के संभावित परमाणु हमले का जवाब देने की क्षमता भी मिल सकती है।

हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर एकमत नहीं हैं कि हालिया युद्ध ने ईरान के लिए परमाणु हथियारों को अनिवार्य बना दिया है या नहीं।

एक पक्ष का तर्क है कि यदि ईरान के पास पहले से परमाणु हथियार होते तो अमेरिका और इज़राइल शायद उस पर हमला नहीं करते। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि बिना परमाणु हथियारों के भी ईरान कई महीनों तक हमलों का सामना करने में सफल रहा है और उसने अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली देशों पर रणनीतिक बढ़त हासिल की है।

ईरान ने यह भी प्रदर्शित किया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावित कर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है। इसलिए संभव है कि भविष्य में यही उसकी सबसे प्रभावी प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे और उसे सक्रिय परमाणु हथियार कार्यक्रम की आवश्यकता न पड़े।

यह भी संभव है कि ईरान ने संवर्धित यूरेनियम का भंडार केवल कूटनीतिक दबाव बनाने और सुरक्षा गारंटी तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में पुनः शामिल होने के उद्देश्य से सुरक्षित रखा हो।

युद्ध शुरू होने से पहले ईरान संकेत दे चुका था कि यदि अमेरिका प्रतिबंध हटाने पर सहमत हो तो वह अपने संवर्धित यूरेनियम का स्तर कम करने को तैयार है। जून में युद्ध समाप्त करने के लिए हुए समझौता ज्ञापन के तहत भी उसने संवर्धित यूरेनियम को कम स्तर पर लाने पर सहमति जताई थी।

इन परिस्थितियों में भविष्य में ईरान के परमाणु हथियार संपन्न बनने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हालांकि, ट्रंप प्रशासन की खुफिया एजेंसियों ने भी पिछले वर्ष सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि ईरान कई दशकों से सक्रिय रूप से परमाणु हथियार विकसित करने के कार्यक्रम पर काम नहीं कर रहा है।

—– क्या कूटनीति समाधान बन सकती है? —–

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2015 में हुआ संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (जेसीपीओए) समझौता इस समस्या का व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत कर चुका था।

इस समझौते पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों—अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन—के साथ जर्मनी तथा ईरान के बीच कई वर्षों की बातचीत के बाद सहमति बनी थी। वर्ष 2018 में ट्रंप प्रशासन द्वारा समझौते से अलग होने से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने पुष्टि की थी कि ईरान अपनी सभी प्रतिबद्धताओं का पालन कर रहा था।

अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने और प्रतिबंध दोबारा लागू करने के बाद ही ईरान ने 20 प्रतिशत से अधिक स्तर पर यूरेनियम संवर्धन फिर शुरू किया।

विश्लेषकों के अनुसार जेसीपीओए जैसा कोई नया समझौता आज भी संभव है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को पहले की तुलना में अधिक रियायतें देनी होंगी। साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का मुद्दा दोनों पक्षों के बीच विवाद का प्रमुख कारण बना रहेगा।

सबसे बड़ी चुनौती दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी है। जेसीपीओए को लागू करने में वर्षों का विश्वास निर्माण लगा था, जबकि अब ईरान के कट्टरपंथी नेताओं का अमेरिकी प्रशासन पर भरोसा लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में वे किसी नए समझौते के बजाय परमाणु हथियार कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के प्रति पहले से अधिक सकारात्मक रुख अपना सकते हैं।

द कन्वरसेशन मनीषा माधव

माधव