‘उद्योग’ की 1978 की व्यापक परिभाषा 2020 की संहिता पर लागू नहीं: उच्चतम न्यायालय
‘उद्योग’ की 1978 की व्यापक परिभाषा 2020 की संहिता पर लागू नहीं: उच्चतम न्यायालय
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को 6:3 के बहुमत से कहा कि 1978 के अपने फैसले में दी गई श्रम हितैषी और व्यापक ‘उद्योग’ की परिभाषा को औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत के फैसले में यह भी कहा कि ‘उद्योग’ की परिभाषा से संबंधित 1978 के सात सदस्यीय पीठ के फैसले पर पुनर्विचार के लिए भेजा गया संदर्भ वैध था।
सात सदस्यीय पीठ ने 21 फरवरी, 1978 को बेंगलुरु जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड की याचिका पर फैसला सुनाते हुए ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा का विस्तार किया था। इसके तहत अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, क्लब और सरकारी कल्याण विभागों के लाखों कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के संरक्षण के दायरे में लाया गया था।
प्रधान न्यायाधीश ने अपने और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति आलोक अराधे तथा न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की ओर से बहुमत का फैसला लिखते हुए स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में विकसित ‘त्रिस्तरीय कसौटी’ (ट्रिपल टेस्ट) यह निर्धारित करने के लिए वैध रहेगी कि किसी गतिविधि को ‘उद्योग’ माना जा सकता है या नहीं।
‘त्रिस्तरीय कसौटी’ का इस्तेमाल हालांकि अब निरस्त किए जा चुके 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत लंबित श्रम संबंधी मामलों में किया जाएगा।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने अलग-अलग फैसले लिखे और मोटे तौर पर प्रधान न्यायाधीश के बहुमत के फैसले से सहमति जताई। दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि ‘उद्योग’ की परिभाषा से संबंधित 1978 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए भेजा गया संदर्भ वैध था।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई, खासकर नौ सदस्यीय पीठ के समक्ष भेजे गए संदर्भ की सुनवाई योग्य होने के मुद्दे पर।
न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने 1978 के फैसले में ‘त्रिस्तरीय कसौटी’ विकसित की थी। इसके तहत व्यापक रूप से माना गया था कि वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन या वितरण के लिए नियोक्ता और कर्मचारियों के सहयोग से होने वाली कोई भी व्यवस्थित गतिविधि ‘उद्योग’ के दायरे में आएगी तथा इस तरह विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को वैधानिक संरक्षण मिलेगा।
बहुमत के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह 2020 की संहिता पर लागू नहीं होगा और नए कानून के तहत आने वाले किसी भी नए मामले का फैसला उसके तथ्यों तथा संदर्भ के आधार पर किया जाएगा।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि 1978 का फैसला सही था और उस पर पुनर्विचार की कोई आवश्यकता नहीं थी।
सभी नौ न्यायाधीश इस बात पर सहमत थे कि 1947 का अधिनियम अब निरस्त हो चुका है और उसकी जगह नया कानून आ गया है, इसलिए यह मामला अब अकादमिक अभ्यास बन गया है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “बहुमत ने माना है कि संदर्भ वैध है और हमने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि बहुमत का फैसला भविष्य में लागू होगा और लंबित मामलों (1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत) का फैसला बेंगलुरु जल आपूर्ति मामले (1978 के फैसले) में दी गई ‘त्रिस्तरीय कसौटी’ की परिभाषा के अनुसार किया जाएगा।”
उन्होंने कहा कि हालांकि 1978 के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों को “2020 के अधिनियम की व्याख्या के लिए व्यापक आधार नहीं माना जाएगा और इसकी व्याख्या स्वतंत्र रूप से की जाएगी।”
विस्तृत फैसला अभी जारी नहीं किया गया है।
श्रम एवं औद्योगिक क्षेत्र को इस फैसले का बेसब्री से इंतजार था क्योंकि इसका कर्मचारियों के अधिकारों और 1947 के अधिनियम के तहत श्रम संरक्षण के लागू होने की स्थिति पर असर पड़ेगा।
शीर्ष अदालत ने 16 फरवरी को नौ सदस्यीय पीठ द्वारा तय किए जाने वाले व्यापक मुद्दे निर्धारित किए थे।
पीठ ने पूछा था, “क्या 1978 के बेंगलुरु जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड मामले में न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर द्वारा दिए गए फैसले के पैराग्राफ 140 से 144 में निर्धारित कसौटी यह तय करने के लिए सही कानून है कि कोई उपक्रम या उद्यम ‘उद्योग’ की परिभाषा के अंतर्गत आता है या नहीं?”
न्यायालय ने पूछा था, ‘‘ क्या औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 (जो प्रतीत होता है कि लागू नहीं हुआ) तथा औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (21 नवंबर, 2025 से प्रभावी) का मुख्य अधिनियम में ‘उद्योग’ शब्द की व्याख्या पर कोई कानूनी प्रभाव पड़ता है?”
उसने कहा था कि नौ सदस्यीय पीठ द्वारा तय किए जाने वाले मुद्दों में यह भी शामिल होगा कि क्या सरकारी विभागों या उनके उपक्रमों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण गतिविधियों और योजनाओं या अन्य उद्यमों को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे) के तहत “औद्योगिक गतिविधियां” माना जा सकता है।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा

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