नयी दिल्ली, 25 फरवरी (भाषा) केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को केंद्र सरकार की 1.7 लाख करोड़ रुपये की सालाना उर्वरक सब्सिडी को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिये किसानों के बैंक खातों में भेजे जाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि इससे उन्हें यह चुनने की आजादी मिलेगी कि वे कौन सा उर्वरक और कितनी मात्रा में खरीदना चाहते हैं।
यहां भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) परिसर में पूसा कृषि विज्ञान मेले को संबोधित करते हुए चौहान ने कहा कि यूरिया का एक बैग जिसकी असल कीमत 2,400 रुपये है, केंद्र सरकार की सब्सिडी की वजह से किसानों तक सिर्फ 265-270 रुपये में पहुंचता है।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर इतनी बड़ी सब्सिडी सीधे डीबीटी के जरिये किसानों के खातों में भेजी जाती है, तो किसान यह तय कर पाएंगे कि उन्हें कौन सा उर्वरक और कितनी मात्रा में खरीदना है। यह प्रणाली यह पक्का करेगी कि सब्सिडी का असली फायदा वही किसान उठाएगा जो खेतों में उर्वरक डालेगा।’’
अभी, भारत में उर्वरक सब्सिडी सीधे किसानों को देने के बजाय मुख्य रूप से कंपनियों को भेजी जाती है। हालांकि, सरकार ने वर्ष 2018 में डीबीटी प्रणाली को लागू किया था, लेकिन उर्वरक बनाने वालों को सब्सिडी का हस्तांतरण किसानों को खुदरा बिक्री के सत्यापन के बाद किया जाता है।
एक सरकारी बयान में कहा गया कि चौहान ने खेती के मशीनीकरण और ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, पॉलीहाउस और ग्रीनहाउस जैसी आधुनिक सिंचाई प्रौद्योगिकी के लिए राज्यों को दिए जाने वाले कोष की और मजबूत निगरानी की भी जरूरत बताई।
खेती के ऋण के बारे में, मंत्री ने कहा कि 75 प्रतिशत छोटे किसानों को अब चार प्रतिशत के ब्याज पर किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) ऋण मिल रहा है।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मकसद सिर्फ कर्ज देना नहीं है, बल्कि यह पक्का करना है कि किसानों को समय पर और बिना देरी के ऋण मिलें, इसके लिए बेहतर प्रणाली बनाने की ज़रूरत है।
भारतीय खेती के लिए कई तरह के तरीकों का सुझाव देते हुए चौहान ने कहा कि सरकार का मकसद देश के खाने के भंडार को भरना, फलों और सब्ज़ियों का उत्पादन बढ़ाना और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना होना चाहिए; सिर्फ़ पेट भरने से आगे बढ़कर बेहतर पौष्टिक खाना देना चाहिए; और एकीकृत कृषि और दूसरे नवाचार के ज़रिये किसानों की आय बढ़ानी चाहिए। 25 फरवरी से शुरू हुए तीन दिन के मेले को मंत्री ने किसानों के लिए ‘‘राष्ट्रीय महाकुंभ’’ बताया। यह देश भर के किसानों, वैज्ज्ञनिकों, उद्यमियों और नीति-निर्माताओं का एक जमावड़ा है, जहां प्रयोगशाला की खोज खेतों तक पहुंचती है और विकसित, आधुनिक और आत्मनिर्भर खेती के लिए रूपरेखा तैयार की जाती है।
उन्होंने आईएआरआई को अगले साल से इस मेले को बड़े स्तर पर आयोजित करने का निर्देश दिया।
भाषा राजेश राजेश अजय
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