नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) ऑस्ट्रेलिया ने भारत की घरेलू गन्ना और चीनी नीतियों को लेकर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में स्पष्टीकरण मांगा है। उसने दावा किया है कि भारत ने 2018-19 से 2024-25 के दौरान सात वर्षों में गन्ने के लिए डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत तय सीमा से काफी अधिक समर्थन दिया।
डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते (एओए) के तहत इस तरह का समर्थन गन्ने के कुल उत्पादन मूल्य के 10 प्रतिशत तक सीमित रखा गया है।
डब्ल्यूटीओ में ऑस्ट्रेलिया की तरफ से जमा कराए गए दस्तावेज के अनुसार, उसने भारत से उसकी घरेलू गन्ना और चीनी नीतियों पर अतिरिक्त स्पष्टीकरण मांगा है। ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक और तीसरे सबसे बड़े निर्यातक के रूप में भारत के चीनी बाजार में होने वाले बदलावों का वैश्विक कीमतों और व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
दस्तावेज के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया, भारत और अन्य डब्ल्यूटीओ सदस्य देशों के साथ भारत के बाजार मूल्य समर्थन और गन्ने के लिए इससे जुड़े कुल बाजार समर्थन (एएमएस) के महत्व पर चर्चा करने को तैयार है।
ऑस्ट्रेलिया ने कहा, ‘‘ऐसा लगता है कि 2018-19 से 2024-25 के सात वर्षों के दौरान भारत ने गन्ने के लिए डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते के अनुच्छेद छह के पैराग्राफ चार में निर्धारित सीमा से बहुत अधिक एएमएस दिया।’’
भारत सरकार हर चीनी सत्र में गन्ने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करती है। यह मूल्य प्रभावी रूप से चीनी मिलों द्वारा किसानों को गन्ने के लिए भुगतान की जाने वाली न्यूनतम कीमत के रूप में काम करता है।
ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि गन्ना किसानों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रीमियम भी दिया जाता है। इसके अलावा, कुछ राज्यों में किसानों को चीनी मिलों से राज्य सरकारों द्वारा तय अतिरिक्त कीमत यानी राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) के तहत भुगतान मिलता है।
ऑस्ट्रेलिया की तरफ से मुहैया कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में बाजार मूल्य समर्थन 2018-19 में 1.125 लाख करोड़ रुपये (15.9 अरब डॉलर) से बढ़कर 2024-25 में 1.52 लाख करोड़ रुपये (17.7 अरब डॉलर) हो गया। यह 2022-23 में 1.55 लाख करोड़ रुपये (18.9 अरब डॉलर) के उच्च स्तर पर पहुंच गया था।
ऑस्ट्रेलिया ने इन गणनाओं के आधार पर दावा किया है कि भारत का गन्ना समर्थन डब्ल्यूटीओ की निर्धारित सीमा से काफी अधिक रहा है।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
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