बैंकों को बचत आकर्षित करने के लिए कामकाज में सुधार, नये और नवोन्मेषी उत्पाद लाने की जरूरत: सूत्र
बैंकों को बचत आकर्षित करने के लिए कामकाज में सुधार, नये और नवोन्मेषी उत्पाद लाने की जरूरत: सूत्र
(राधा रमण मिश्रा)
नयी दिल्ली, 15 फरवरी (भाषा) बैंकों को बचत आकर्षित करने के लिए कर नीति की नहीं बल्कि उपयुक्त कदम उठाने और परिचालन के स्तर पर कुशल बनने के साथ नये और नवोन्मेषी उत्पाद लाने की जरूरत है। बैंकों में बचत दर में कमी के बीच एक शीर्ष आधिकारिक सूत्र ने यह बात कही है।
आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार, घरेलू बचत दर वित्त वर्ष 2011-12 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 34.6 प्रतिशत पर थी जो 2023-24 में घटकर 30.7 प्रतिशत पर आ गयी। वहीं वित्त वर्ष 2024-25 में सालाना वित्तीय बचत में बैंक जमा का हिस्सा घटकर 35 प्रतिशत रह गया है, जो वित्त वर्ष 2011-12 के 58 प्रतिशत से काफी कम है।
सूत्र ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा, ‘‘बैंक में मूलभूत समस्या यह है कि उन्होंने जमा के आगे देखा ही नहीं, जबकि दुनिया में ऐसा नहीं है। पूंजी बाजार की बात करें तो हम सब शेयर की बात करते हैं। बॉन्ड की चर्चा कम होती है। बैंक, बॉन्ड के जरिये सस्ती दर पर लंबी अवधि के लिए पैसा जुटा सकते हैं और इसके आधार पर परियोजनाओं के लिए कर्ज दे सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘आज के दिन बैंक अच्छी गुणवत्ता वाले कर्ज दें, रिटर्न अच्छा लें तो वे जमाकर्ता को भी अच्छा प्रतिफल दे पाएंगे। बैंक को कर्ज व्यवस्था सुधारने की जरूरत है। बैंक कहते हैं कि वे आठ प्रतिशत पर पैसा उठाते हैं। ऐसे में जमाकर्ता को छह प्रतिशत ही दे पाते हैं क्योंकि दो प्रतिशत हमारी लागत है। बैंक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर, परिचालन स्तर पर कुशलता बढ़ाकर, गैर-जरूरी खर्च को कम कर दो प्रतिशत की अपनी लागत को कम करके ग्राहक को अधिक ब्याज दे सकते हैं।’’
बचत दर में कमी के बीच इसे आकर्षक बनाने के बारे में पूछे जाने पर आधिकारिक सूत्र ने कहा, ‘‘कर नीति का मकसद अब बचत के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना नहीं है बल्कि इसके जरिये यह सुनिश्चित किया गया है कि आप अपनी कमाई पर कर दीजिए और बचे पैसे को अपने हिसाब से खर्च कीजिए या फिर निवेश कीजिए। बचत को आकर्षक बनाने के लिए बैंकों को परिचालन के स्तर पर कुशल बनने के साथ सावधि जमा के अलावा बचत के नवोन्मेषी उत्पाद लाने की जरूरत है।’’
उल्लेखनीय है कि सरकार कर व्यवस्था को सरल और सुगम बना रही है। इसी के तहत नई आयकर व्यवस्था में सभी के लिए 12 लाख रुपये तक की आय और नौकरीपेशा के मामले में 12.75 लाख रुपये (75 हजार की मानक कटौती के साथ) तक की आय के लिए कोई कर देने की जरूरत नहीं है। इसमें किसी प्रकार की छूट नहीं दी गयी है। वहीं पुरानी कर व्यवस्था में लघु बचत योजनाओं समेत कई मदों में बचत और निवेश पर छूट दी गयी है।
उन्होंने कहा, ‘‘बैंकों को बचत को आकर्षित करने के लिए कदम उठाने होंगे, उन्हें परिचालन के स्तर पर कुशल बनने के साथ नये और नवोन्मेषी उत्पाद लाने होंगे।’’
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी अर्थव्यवस्था में वृद्धि तभी होगी जब निवेश होगा और देश में जो निवेश होगा, उस पैसे का प्रमुख स्रोत घरेलू बचत है। घरेलू बचत खासकर परिवार की बचत में हाल के दिनों में कमी आई है।
सूत्र ने कहा, ‘‘आज बैंकों के पास जो पैसा जमा है, उसमें लगभग 90 प्रतिशत से ज्यादा दो साल से कम की अवधि के लिए और पांच लाख रुपये से कम की जमा के रूप में है। लोगों ने इस पैसे को इसलिए रखा है कि वह सुरक्षित रहे और जरूरत पड़ने पर उसे निकाल सके। लोगों ने अपने पैसे दूसरे जोखिम वाले उत्पादों में भी डाल रखे होंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अब आप खुद सोचिए दो साल की ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ यानी सावधि जमा का पैसा लेकर बैंक 10 साल की परियोजना के लिए कैसे कर्ज देंगे? इस बारे में बैंकों को सोचने की जरूरत है।’’
सूत्र ने कहा, ‘‘अब अन्य देशों के बैंक क्या करते हैं? उनके पास भी जमा होती है, लेकिन इस पर निर्भरता इतनी नहीं है। दुनिया के विभिन्न देशों में निवेश बैंक की एक धारणा है जिसमें बचत और निवेश दोनों तरह के पैसे हैं। हमारे यहां पर आपको निवेश करना है तो म्यूचुअल फंड में जाते हैं। सवाल यह उठता है कि बैंक ऐसी बचत को प्राप्त करने के लिए क्यों नहीं कदम उठाते? क्योंकि बैंकों ने ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं बना रखी।’’
इस बारे में पूर्व वित्त सचिव ने सुभाष चंद्र गर्ग ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ कर नीति को किसी भी तरह के बचत को लेकर तटस्थ होना चाहिए। चाहे वह इक्विटी हो, बॉन्ड हो, बैंक जमा हो या म्यूचुअल फंड, कर नीति तटस्थ होनी चाहिए।’’
उन्होंने यह भी कहा, ‘‘ बचतकर्ताओं को अपने विवेक के साथ निर्णय लेने दें। इसके बजाय सरकार को राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (एनएससी), आवर्ती जमा, एफडी जैसी कई बचत योजनाओं को बंद कर देना चाहिए।’’
उल्लेखनीय है कि एक फरवरी को पेश केंद्रीय बजट में विकसित भारत के लिए बैंक तैयार करने को लेकर उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा की गई है। इसका उद्देश्य वित्तीय क्षेत्र को 2047 तक भारत के विकास लक्ष्यों के अनुरूप बनाना है।
भाषा रमण
अजय
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