तलाशी का अग्रिम नोटिस देने पर आयकर जांचकर्ताओं की कठिनाइयों का न्यायालय ने किया जिक्र

तलाशी का अग्रिम नोटिस देने पर आयकर जांचकर्ताओं की कठिनाइयों का न्यायालय ने किया जिक्र

तलाशी का अग्रिम नोटिस देने पर आयकर जांचकर्ताओं की कठिनाइयों का न्यायालय ने किया जिक्र
Modified Date: February 10, 2026 / 03:57 pm IST
Published Date: February 10, 2026 3:57 pm IST

नयी दिल्ली, 10 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को डिजिटल युग में जांचकर्ताओं के सामने आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को रेखांकित किया और कहा कि तलाशी तथा जब्ती से पहले अग्रिम नोटिस देना जांच शुरू होने से पहले ही उसे प्रभावी रूप से खत्म कर सकता है।

शीर्ष अदालत आयकर अधिनियम की धारा 132 के तहत तलाशी और जब्ती की शक्तियों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अधिकारी इन शक्तियों का दुरुपयोग कर सकते हैं।

आयकर अधिनियम की धारा 132 आईटी अधिकारियों को तलाशी और जब्ती करने का अधिकार देती है। ऐसा तभी किया जा सकता है, जब उनके पास यह मानने का ठोस कारण हो कि किसी व्यक्ति के पास अघोषित आय, संपत्ति या दस्तावेज हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने जनहित याचिकाकर्ता विश्वप्रसाद अल्वा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े की दलीलों को कुछ समय तक सुना और बाद में मामले पर विचार दो सप्ताह के लिए टाल दिया।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने तलाशी और जब्ती के मामलों में अग्रिम नोटिस जारी करने की व्यावहारिक चुनौतियों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि अग्रिम नोटिस देने से जांच का मूल उद्देश्य ही विफल हो सकता है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि तलाशी और जब्ती के लिए नोटिस दिया जाता है, तो साक्ष्य नष्ट होने की संभावना रहती है। डिजिटल रिकॉर्ड के खिलाफ ऐसी जांच को दबाने का सबसे अच्छा तरीका उपकरण को ही नष्ट कर देना है।”

वरिष्ठ वकील हेगड़े ने तर्क दिया कि संबंधित प्रावधान कर अधिकारियों के हाथों में अत्यधिक शक्ति देता है, और इससे न केवल कथित कर चोरी करने वाला, बल्कि तीसरे पक्ष भी दंडात्मक कार्रवाई के दायरे में आ जाते हैं।

भाषा पाण्डेय अजय

अजय


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