नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में ऋग्वेद से लेकर रामायण तक और मार्क टुली से लेकर व्लादिमीर लेनिन तक का उद्धरण दिया गया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट से पहले वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा संसद के दोनों सदनों में पेश की। आर्थिक समीक्षा अगले वित्त वर्ष में अपनाई जाने वाली नीतिगत कार्रवाइयों की पृष्ठभूमि बयां करती है।
कुल 739 पृष्ठों वाली आर्थिक समीक्षा में कई संदर्भों का उल्लेख किया गया है।
समीक्षा में ऋग्वेद के मंडल 10, सूक्त 191, श्लोक 2 का जिक्र किया गया है जो कहता है, ‘‘मनुष्यों को मिलकर चलना चाहिए, एक साथ बोलना चाहिए। इससे राष्ट्र, समाज और परिवार की उन्नति होती है। आपस में मतभेद न हो….।’’
समीक्षा के अनुसार, रामायण जटिल और प्रतिस्पर्धी परिस्थितियों में रणनीतिक शिक्षा के लिए एक मूल्यवान रूपक प्रदान करता है।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, ‘‘युद्ध कांड में, रावण की पराजय का क्षण विवेक का पाठ बन जाता है, क्योंकि भगवान राम यह दर्शाते हैं कि शत्रुओं से भी उनके मूल्य या तौर-तरीके अपनाए बगैर अंतर्दृष्टि प्राप्त की जा सकती है।’’
समीक्षा में उल्लेख किया गया है, ‘‘यह सीख सूक्ष्म होते हुए भी शक्तिशाली है: सीखना स्वायत्तता के अनुकूल है। आज की विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्भर हुए बगैर सीखने की क्षमता एक आवश्यक रणनीतिक कौशल बन जाती है।’’
‘सामरिक मजबूती और सामरिक अपरिहार्यता का निर्माण: राज्य, निजी क्षेत्र और नागरिकों की भूमिका’ नामक अध्याय में भगवद् गीता का भी एक उद्धरण है।
गीता के दूसरे अध्याय के 47वां श्लोक कहता है, “आपको केवल कर्म करने का अधिकार है, अपने श्रम के फल पर नहीं। अपने कर्म के फल को अपना मकसद न बनाएं, न ही अपने आप को निष्क्रियता में पड़ने दें।’’
इसी तरह, आर्थिक समीक्षा के आयात प्रतिस्थापन पर केंद्रित एक अध्याय में चाणक्य का एक उद्धरण दिया गया है, जिसके मुताबिक, “कल्याण का आधार धर्म है। धर्म का आधार आर्थिक शक्ति है। और आर्थिक शक्ति का आधार राज्य है।”
समीक्षा में भारत के सूचना का अधिकार कानून, 2005 की पुनर्समीक्षा का समर्थन करने के लिए ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के एक कथन का हवाला दिया गया है।
ब्लेयर ने इसी तरह का एक कानून लागू करने पर खेद जताते हुए कहा था, ‘‘आप लोगों के साथ अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों पर गोपनीय चर्चा करने में सक्षम हुए बिना सरकार नहीं चला सकते हैं।’’
आर्थिक समीक्षा में भारत मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली के कथन का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है ‘‘यदि भारत को अपनी वास्तविक क्षमता का उपयोग करना है, तो उसे ‘शासक राज’ से ‘नागरिक राज’ की ओर कदम बढ़ाना होगा।’’
समीक्षा में लेनिन के उस मशहूर कथन का भी उल्लेख है जिसमें कहा गया है, ‘‘कई दशक ऐसे होते हैं जिनमें कुछ नहीं होता और कई सप्ताह ऐसे होते हैं जिनमें दशकों का काम हो जाता है।’’
इस उद्धरण के साथ आर्थिक समीक्षा कहती है, ‘‘हम एक ऐसे दौर में हैं जहां ऐसा लगता है कि दशकों का काम कुछ सप्ताह में हो रहा है।’’
भाषा रमण प्रेम अजय
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