नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) खाद्य तेल के उद्योग निकाय एसईए ने तिलहनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने, खेती के आधुनिक तरीके अपनाने और सोच-समझकर उपभोग करने की आदतें बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
अपने सदस्यों को लिखे एक पत्र में सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एसईए) के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने खाद्य तेल के बढ़ते आयात खर्च पर चिंता जताई। उन्होंने पश्चिम एशिया संकट के कारण पैदा हुई रुकावटों से निपटने के लिए नीतिगत समर्थन की भी मांग की।
उन्होंने कहा, ‘‘खाद्य तेल के सोच-समझकर उपभोग के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील सिर्फ एक जीवनशैली का सुझाव नहीं है — इसका गंभीर आर्थिक और रणनीतिक महत्व है।’’
भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरतों का 60 प्रतिशत आयात करता है, ऐसे में अस्थाना ने बताया कि वैश्विक कीमतों में मामूली उतार-चढ़ाव भी बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा के बाहर जाने का कारण बनता है।
भारत ने अक्टूबर में समाप्त हुए विपणन वर्ष 2024-25 के दौरान लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये का 1.6 करोड़ टन खाद्य तेल आयात किया।
अस्थाना का मानना है कि सिर्फ़ अल्पकालिक उपाय ही काफी नहीं हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत की दीर्घकालिक मजबूती घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने, खेती के आधुनिक तरीके अपनाने और सोच-समझकर उपभोग करने की आदतें बनाने पर निर्भर करती है। आज थोड़ी कड़ाई बरतना, कल एक ऐसे संकट से जूझने से कहीं ज्यादा समझदारी भरा है जिससे बचा जा सकता है।’’
फसल वर्ष 2025-26 (जुलाई-जून) में भारत का घरेलू तिलहन उत्पादन 409.98 लाख टन होने का अनुमान है।
एसईए अध्यक्ष ने बताया कि अल नीनो, दक्षिण-पूर्व एशियाई बायोडीजल नियमों और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति पर पड़े दबाव के चलते दुनिया भर में जिंसों की कीमत और माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है।
उन्होंने कहा कि रुपये के कमजोर होने से आयात की लागत काफ़ी बढ़ गई है, जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और कुल आयात खर्च पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए, अस्थाना ने कहा कि एसईए ने संबंधित मंत्रालयों को एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें माल ढुलाई और बीमा की बढ़ती लागत, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटें, मुद्रा में उतार-चढ़ाव, कार्यशील पूंजी की बढ़ती जरूरतें और घरेलू खाद्य तेल की कीमतों पर पड़ रहे दबाव जैसी चिंताओं को उजागर किया गया है।
एसईए ने माल ढुलाई में सहायता, खाद्य तेल के जहाजों के लिए बंदरगाह पर प्राथमिकता, तेल रहित खल (डीओसी) के निर्यात के लिए प्रोत्साहन और कार्यशील पूंजी में सहायता जैसे उपायों का सुझाव दिया है।
भाषा राजेश राजेश अजय
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