नयी दिल्ली, 19 फरवरी (भाषा) दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस के चेयरमैन नंदन नीलेकणि ने बृहस्पतिवार को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कृत्रिम मेधा (एआई) के लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक नहीं पहुंचने पर इसके खिलाफ प्रतिरोध पैदा हो सकता है, जो इस प्रौद्योगिकी की प्रगति को प्रभावित कर सकता है।
नीलेकणि ने यहां आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ के एक संवाद सत्र में कहा कि फिलहाल एआई के विकास में ‘रेस टू द टॉप’ (बेहतर प्रौद्योगिकी की होड़) और ‘रेस टू द बॉटम’ (नकारात्मक उपयोग में तेजी) दोनों तरह की स्थितियां हैं जिनमें दूसरा पहलू ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि एआई का उपयोग समाज के लिए उपयोगी साबित नहीं हुआ तो इसके प्रति लोगों की धारणा नकारात्मक हो सकती है।
नीलेकणि ने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि हम सभी, जो एआई को मानवता के लिए उपयोगी बनाना चाहते हैं, उन्हें इसके प्रसार को सुनिश्चित करने के लिए अपने प्रयास बढ़ाने होंगे और उन्हें दोगुना करना होगा। ऐसा नहीं होने पर इसके नतीजे बहुत मुश्किल हो सकते हैं क्योंकि इसके खिलाफ विरोध पैदा होने की आशंका है।’’
उन्होंने कहा कि एआई के कुछ मौजूदा उपयोग जैसे डीपफेक सामग्री या बढ़ती बिजली लागत जैसी चिंताएं लोगों में इसके प्रति असंतोष पैदा कर सकती हैं।
नीलेकणी ने कहा, ‘‘जिस तरह शारीरिक श्रम वाले कामगारों में असंतोष ने वैश्वीकरण को झटका दिया था। उसी तरह दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों में उपजा असंतोष एआई की प्रगति को प्रभावित कर सकता है।’’
उन्होंने कहा कि एआई को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। भारत के पास आधार और एकीकृत भुगतान प्रणाली (यूपीआई) जैसी पहल के जरिये बड़ी आबादी तक प्रौद्योगिकी पहुंचाने का अनुभव है।
नीलेकणि ने कहा कि एआई को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए भाषा की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। लोगों को कंप्यूटर से अपनी स्थानीय भाषा या बोलियों में संवाद करने की सुविधा मिलनी चाहिए, ताकि प्रौद्योगिकी का उपयोग ज्यादा समावेशी बन सके।
इस संवाद सत्र में शामिल एंथ्रोपिक कंपनी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) डारियो अमोडेई ने कहा कि ‘वैश्विक दक्षिण’ (दक्षिण गोलार्द्ध के विकासशील देशों) में एआई के लाभ अधिक स्पष्ट हो सकते हैं और भारत की तकनीकी क्षमता तथा इसे अपनाने की तत्परता आर्थिक वृद्धि को गति दे सकती है।
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